मासूमों की सुरक्षा से खिलवाड़: क्या प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है?
स्पीड ब्रेकर नहीं, रोशनी नहीं, सुरक्षा नहीं: बिचपुरी-मघटई मार्ग पर बच्चों की जिंदगी भगवान भरोसे
तपेश शर्मा की चेतावनी के बाद भी नहीं जागा सिस्टम, स्कूलों के हजारों बच्चे रोज मौत के मुहाने से गुजरने को मजबूर
हजारों स्कूली बच्चे रोजाना बिचपुरी तिराहे और मघटई तिराहे से जान जोखिम में डालकर गुजरने को मजबूर, शिक्षक नेता तपेश शर्मा लगातार उठा रहे सुरक्षा का मुद्दा
हजारों नौनिहाल रोज मौत के साये में पार कर रहे हैं बिचपुरी तिराहा
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आगरा। बिचपुरी रेलवे क्रॉसिंग और मघटई तिराहे के आसपास का क्षेत्र इन दिनों हजारों स्कूली बच्चों के लिए खतरे का पर्याय बनता जा रहा है। यहां से प्रतिदिन करीब दस स्कूलों के छात्र-छात्राएं गुजरते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए न तो पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था है, न स्पीड ब्रेकर, न ट्रैफिक नियंत्रण के प्रभावी इंतजाम। लगातार हो रहे हादसों और बढ़ते खतरे के बावजूद जिम्मेदार विभागों की उदासीनता ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर प्रशासन किसी बड़े हादसे या मासूमों की जान जाने का इंतजार क्यों कर रहा है।
बच्चों की सुरक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं तपेश शर्मा
क्षेत्र की इस गंभीर समस्या को लेकर शिक्षक नेता तपेश शर्मा लगातार आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने न केवल जिलाधिकारी मनीष बंसल, डीसीपी ट्रैफिक सोनम कुमार और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधिकारियों से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराया, बल्कि लिखित रूप से भी तत्काल कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल सड़क या यातायात की समस्या नहीं, बल्कि हजारों बच्चों के जीवन और सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है।
ताज्जुब की बात यह है कि इतने बड़े खतरे के बावजूद आसपास के लगभग दस स्कूलों की ओर से अब तक कोई प्रभावी पहल सामने नहीं आई है।
रोज गुजरते हैं हजारों बच्चे, लेकिन सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं
बिचपुरी तिराहे और रेलवे क्रॉसिंग के आसपास प्रतिदिन स्कूल बसों, वैनों, दोपहिया वाहनों और पैदल चलने वाले बच्चों की भारी आवाजाही रहती है। इसके बावजूद यहां एक भी प्रभावी स्पीड ब्रेकर नहीं है। भारी वाहन, डंपर और ट्रक तेज रफ्तार से गुजरते हैं, जिससे हर समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को स्कूल पहुंचाना अब एक चुनौती बन गया है।
स्पीड ब्रेकर का अभाव और तेज रफ्तार भारी वाहन किसी भी समय बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।
खराब स्ट्रीट लाइटें बढ़ा रही हैं खतरा
दिन में यातायात अव्यवस्था और रात में अंधेरा इस समस्या को और गंभीर बना देता है। तिराहे और आसपास लगी कई स्ट्रीट लाइटें लंबे समय से खराब पड़ी हैं। अंधेरे के कारण वाहन चालकों को सामने से आने वाले वाहन दिखाई नहीं देते, जिससे देर शाम और रात में दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अनेक बार शिकायतों के बावजूद व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ है।
हादसे अब अपवाद नहीं, रोजमर्रा की हकीकत बन चुके हैं
स्थानीय निवासियों के अनुसार इस क्षेत्र में सड़क दुर्घटनाएं अब असामान्य घटना नहीं रहीं। आए दिन होने वाले हादसे प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करते हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा पूरे क्षेत्र को झकझोर सकता है।
क्षेत्रवासियों का मानना है कि अब हादसे खबर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चिंताजनक वास्तविकता बन चुके हैं।
स्कूलों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि जिन लगभग दस स्कूलों के हजारों विद्यार्थी प्रतिदिन इस मार्ग से गुजरते हैं, उनकी ओर से अब तक कोई संगठित पहल या सार्वजनिक चिंता सामने नहीं आई है। अभिभावकों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर स्कूल प्रशासन को भी आगे आकर प्रशासन पर दबाव बनाना चाहिए।
मघटई तिराहे पर भी वर्षों से उपेक्षित हैं सुरक्षा सुविधाएं
मघटई तिराहा भी सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील बना हुआ है। यहां लंबे समय से हाईमास्ट लाइट खराब पड़ी है। साथ ही ट्रैफिक लाइट, पर्याप्त स्पीड ब्रेकर और नियमित ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था नहीं होने से दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। रेलवे फाटक पर लगने वाला जाम स्थिति को और अधिक जटिल बना देता है।
जनहित में स्वयं आगे आए तपेश शर्मा
जहां सरकारी व्यवस्थाएं अपेक्षित गति से काम नहीं कर रहीं, वहीं शिक्षक नेता तपेश शर्मा ने जनसहयोग से मघटई तिराहे पर दो स्ट्रीट लाइटें लगवाकर एक सकारात्मक पहल की है। स्थानीय लोगों ने इसे सराहनीय कदम बताते हुए कहा कि इससे रात के समय आवागमन करने वाले लोगों को कुछ राहत मिली है। हालांकि नागरिकों का मानना है कि स्थायी समाधान केवल प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सुरक्षा व्यवस्था लागू होने से ही संभव है।

अब कार्रवाई की जरूरत, आश्वासनों की नहीं
क्षेत्रवासियों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे पर अब केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। बिचपुरी तिराहा और मघटई तिराहा पर तत्काल स्पीड ब्रेकर, ट्रैफिक सिग्नल, कार्यशील स्ट्रीट लाइटें और नियमित ट्रैफिक पुलिस की तैनाती सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे पहले कि कोई मासूम किसी बड़े हादसे का शिकार बने, जिम्मेदार विभागों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
“बच्चों की सुरक्षा पर समझौता किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।”
संपादकीय
सड़कें केवल वाहनों के आवागमन का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही का भी आईना होती हैं। जब किसी क्षेत्र में हजारों बच्चे प्रतिदिन भय और असुरक्षा के बीच स्कूल जाने को मजबूर हों, तब यह केवल ट्रैफिक व्यवस्था की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय बन जाती है।
बिचपुरी और मघटई तिराहे की स्थिति लंबे समय से चेतावनी दे रही है। शिक्षक नेता तपेश शर्मा द्वारा लगातार जिलाधिकारी, डीसीपी ट्रैफिक और पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के समक्ष यह मुद्दा उठाया जाना इस बात का प्रमाण है कि समस्या वास्तविक और गंभीर है। इसके बावजूद यदि हालात जस के तस बने हुए हैं तो यह चिंताजनक है।
इस पूरे मामले का सबसे पीड़ादायक पक्ष यह है कि जिन बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, वही सबसे अधिक जोखिम में हैं। प्रशासन, ट्रैफिक विभाग, लोक निर्माण विभाग और संबंधित शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर इस समस्या का तत्काल समाधान निकालना चाहिए। कोई भी व्यवस्था किसी बड़ी दुर्घटना के बाद सक्रिय हो, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है।
समय की मांग है कि सुरक्षा इंतजाम अभी किए जाएं, न कि किसी मासूम की जान जाने के बाद।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
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