आगरा नगर निगम में सियासी संग्राम: शौचालय निर्माण का प्रस्ताव अटकाने से नाराज भाजपा पार्षद सुनील करमचंदानी ने नगर आयुक्त के चैंबर में दिया धरना

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उत्तर प्रदेश के आगरा नगर निगम में विकास कार्यों की फाइलों की सुस्त रफ्तार और कथित पक्षपात को लेकर सत्तारूढ़ दल के मनोनीत पार्षद सुनील करमचंदानी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। शाहगंज क्षेत्र में करीब छह महीने से लंबित एक सार्वजनिक शौचालय के निर्माण प्रस्ताव पर कोई ठोस कार्रवाई न होने से क्षुब्ध होकर पार्षद सीधे नगर आयुक्त के चैंबर में जा पहुंचे और वहीं फर्श पर धरने पर बैठ गए।

पार्षद ने निगम अधिकारियों पर गंभीर भेदभाव का आरोप लगाते हुए यह सवाल उठाया कि उनके द्वारा दिए गए प्रस्ताव को महीनों तक लटका कर रखा गया, जबकि उसी क्षेत्र से जुड़े एक विपक्षी पार्षद के प्रस्ताव पर तेजी से टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया।

​सामने आया तीन फाइलों का पेंच और नगर आयुक्त का हस्तक्षेप

​यह मामला तूल पकड़ने के बाद नगर आयुक्त ने तत्काल प्रभाव से संबंधित निर्माण विभाग के अधिकारियों से पूरे प्रकरण की पत्रावली और रिपोर्ट तलब की। जब फाइलों की पड़ताल की गई, तो यह बात सामने आई कि निर्माण विभाग की ओर से लगभग 32 लाख रुपये के इस कार्य के लिए कुल तीन अलग-अलग फाइलें तैयार कर दी गई थीं। स्थिति की नजाकत को भांपते हुए नगर आयुक्त ने अधिकारियों को दो फाइलों पर पूरी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाने के सख्त निर्देश दिए। इसके पश्चात, मौके पर मौजूद अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों ने काफी देर तक पार्षद को समझाया-बुझाया और उन्हें धरने से उठाकर कुर्सी पर बैठाया। प्रस्तावित शौचालय निर्माण का कार्य शीघ्र शुरू कराने के पक्के आश्वासन के बाद आखिरकार पार्षद का गुस्सा शांत हुआ।

​छह महीने से निगम के चक्कर काट रहे थे पार्षद

घटना के संबंध में सुनील करमचंदानी ने बताया कि शाहगंज इलाके के रुई की मंडी क्षेत्र में स्थानीय निवासियों को एक सार्वजनिक शौचालय की अत्यंत आवश्यकता थी। जनता की इस मांग और हित को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बीते 21 अप्रैल 2026 को नगर निगम के समक्ष शौचालय निर्माण का प्रस्ताव विधिवत प्रस्तुत किया था। इसके लिए बाकायदा प्रोजेक्ट फाइल भी तैयार करवाई गई थी।

पार्षद का कड़ा आरोप है कि प्रस्ताव सौंपने के बाद से वह लगातार नगर निगम के दफ्तर और संबंधित विभागों के चक्कर काटते रहे, लेकिन उनकी फाइल एक इंच भी आगे नहीं खिसकी। कई महीने बीत जाने के बावजूद जब टेंडर प्रक्रिया शुरू नहीं हुई, तो उनका असंतोष और अधिक बढ़ता चला गया।

विपक्षी पार्षद की फाइल को प्राथमिकता देने का आरोप

यह विवाद उस वक्त और अधिक गहरा गया जब उसी क्षेत्र में शौचालय निर्माण के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पार्षद कप्तान सिंह चाहर की तरफ से भी एक प्रस्ताव दाखिल किया गया। सुनील करमचंदानी का यह आरोप है कि उनकी पुरानी फाइल के लंबित रहते हुए भी अधिकारियों ने बाद में आई इस नई फाइल को प्राथमिकता दी और उसे तुरंत टेंडर प्रक्रिया तक पहुंचा दिया।

पार्षद ने आपत्ति जताई कि जब दोनों ही प्रस्ताव एक ही क्षेत्र की जनता की बुनियादी जरूरत से जुड़े थे, तो उनके प्रस्ताव पर महीनों तक कुंडली मारकर क्यों बैठे रहे? उन्होंने आरोप लगाया कि उनके प्रस्ताव को दरकिनार कर दूसरे पार्षद के काम को आगे बढ़ाने से जनता के बीच यह गलत संदेश गया है कि नगर निगम में भी विकास कार्यों के आवंटन में राजनीतिक भेदभाव किया जा रहा है। हालांकि, यह पार्षद के अपने राजनीतिक आरोप थे, जबकि इसके उलट नगर आयुक्त ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि विकास कार्यों को किसी दल विशेष को देखकर नहीं, बल्कि जनता की वास्तविक जरूरत और प्राथमिकता के आधार पर स्वीकृत किया जाता है।

धरने पर बैठने के बाद मिला समाधान

विरोध जताने के लिए सुनील करमचंदानी सीधे नगर आयुक्त के कक्ष में पहुंचे और जमीन पर बैठ गए। उन्होंने अधिकारियों के समक्ष अपनी पीड़ा रखते हुए कहा कि छह महीने से फाइल लेकर दफ्तरों के धक्के खाने के बावजूद जमीन पर कोई काम शुरू नहीं हो सका है। मामला गंभीर होता देख नगर आयुक्त ने तत्काल फाइल मंगवाई, जिसमें 32 लाख रुपये के कार्य से जुड़ी तीन फाइलें सामने आईं। अधिकारियों को दो फाइलें व्यवस्थित करने के निर्देश देने और काम जल्द शुरू कराने का भरोसा दिए जाने के बाद माहौल शांत हुआ।

निगम की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए सवाल

​एक अदद सार्वजनिक शौचालय के निर्माण से शुरू हुआ यह पूरा घटनाक्रम अब नगर निगम के भीतर कामकाज के तौर-तरीकों और फाइलों के निस्तारण की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ जहां पार्षद छह महीने की देरी और पक्षपात का मुद्दा उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एक ही काम के लिए तीन अलग-अलग फाइलें सामने आ जाने से प्रशासनिक व्यवस्था की पोल भी खुली है।

अब नगर निगम के सामने एक तरफ जहां इस शौचालय निर्माण को जल्द पूरा कराने की चुनौती है, वहीं यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि एक ही कार्य के लिए तीन फाइलें क्यों और कैसे बनीं, ताकि भविष्य में ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

Dr. Bhanu Pratap Singh