टीएन अग्रवाल बोले—सरकार की सुविधा व्यापारियों के लिए मुसीबत न बने, डिजिटल भुगतान पर शुल्क से बढ़ेगा आर्थिक बोझ
आगरा। यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) लेन-देन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) व्यवस्था के विरोध में शनिवार को देशव्यापी आंदोलन के अंतर्गत आगरा व्यापार मंडल ने कलेक्ट्रेट पर अध्यक्ष टीएन अग्रवाल के नेतृत्व में जिलाधिकारी मनीष बंसल को ज्ञापन सौंपा। व्यापारियों ने ₹2,000 से अधिक के सामान्य व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लागू नहीं करने की मांग की। उनका कहना था कि यूपीआई ने डिजिटल भुगतान को सरल और पारदर्शी बनाया है। इस पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से छोटे और मध्यम व्यापारियों की लागत बढ़ेगी।
अध्यक्ष टीएन अग्रवाल ने कहा कि सरकार द्वारा दी गई सुविधा आज व्यापारियों के लिए मुसीबत बनती नजर आ रही है। ग्राहक ऑनलाइन भुगतान करते हैं, लेकिन यूपीआई पर प्रस्तावित शुल्क का भार भुगतान करने वाले के बजाय भुगतान प्राप्त करने वाले व्यापारी पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यूपीआई के कारण देश में लगभग 90 प्रतिशत लेन-देन एक नंबर यानी पारदर्शी तरीके से होने लगे हैं। सरकार को भी इससे हजारों करोड़ रुपये का कर राजस्व मिल रहा है। ऐसे में डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने के बजाय इसे और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
संदीप गुप्ता और दिलीप खूबचंदानी ने कहा कि यूपीआई पर शुल्क लगाने से देश में कालाबाजारी बढ़ने की आशंका है। यूपीआई ने भारत को डिजिटल ट्रांजैक्शन के मामले में विश्व में अग्रणी पहचान दिलाई है। इसकी सरलता और सुविधा के कारण लोग नकद भुगतान छोड़कर ऑनलाइन भुगतान की ओर बढ़े हैं। यदि इस पर अतिरिक्त शुल्क लगाया गया तो डिजिटल लेन-देन में गिरावट आ सकती है और लोग दोबारा नकद भुगतान को प्राथमिकता देने लगेंगे।
अमित मोरियानी ने कहा कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी कारोबार को आसान बनाना देश का प्रमुख नारा रहा है। यूपीआई ट्रांजैक्शन इस उद्देश्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके माध्यम से समय की बचत होती है और भुगतान की प्रक्रिया आसान बनती है। यदि यूपीआई पर एमडीआर शुल्क लगाया गया तो व्यापारियों पर भुगतान का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा, जिससे कारोबार की लागत बढ़ेगी और व्यापार करना महंगा हो सकता है।
राकेश बंसल और राजेश अग्रवाल ने कहा कि यूपीआई ने छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए भुगतान प्राप्त करना आसान बनाया है। कम लागत और तत्काल भुगतान इसकी सबसे बड़ी विशेषताएं हैं। प्रस्तावित एमडीआर व्यवस्था से व्यापारियों के लाभांश पर असर पड़ेगा। सरकार को इस व्यवस्था को लागू करने से पहले व्यापारियों की समस्याओं को समझना चाहिए और उन्हें राहत प्रदान करनी चाहिए।
राजीव गुप्ता और साहूकार सिंह चाहर ने कहा कि यूपीआई को लोकप्रिय बनाने में व्यापारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। व्यापारियों ने ग्राहकों को डिजिटल भुगतान के लिए प्रोत्साहित किया और इससे लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ी है। अब यदि भुगतान स्वीकार करने पर ही व्यापारी को अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा तो यह व्यवस्था उनके लिए आर्थिक परेशानी पैदा करेगी। सरकार को यूपीआई को सस्ता बनाए रखने के साथ व्यापारियों को प्रोत्साहन देना चाहिए।
राजेश सिंघल और दुष्यंत गर्ग ने कहा कि यूपीआई पर एमडीआर लागू करने से पहले व्यापारिक संगठनों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। किराना, कपड़ा, हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा, खाद्यान्न, होटल-रेस्टोरेंट और अन्य कारोबार सीमित लाभांश पर चलते हैं। ऐसे में प्रत्येक डिजिटल लेन-देन पर लगने वाला शुल्क सालभर में बड़ी लागत बन सकता है। उन्होंने मांग की कि सामान्य व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित शुल्क लागू न किया जाए तथा छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान प्रोत्साहन योजना शुरू की जाए।
ज्ञापन में रखीं प्रमुख मांगें
आगरा व्यापार मंडल ने ज्ञापन के माध्यम से मांग की कि ₹2,000 से अधिक के सामान्य व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू न किया जाए।
छोटे व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान प्रोत्साहन एवं छूट योजना शुरू हो। भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और व्यापारी संगठनों के प्रतिनिधियों की स्थायी विचार-विमर्श व्यवस्था बनाई जाए। नई व्यवस्था लागू करने से पहले व्यापारियों की समस्याओं का व्यापक अध्ययन कराया जाए और यूपीआई को कम लागत वाली भुगतान प्रणाली बनाए रखा जाए।
ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर महामंत्री अशोक मंगवानी, नरेंद्र बंसल, जय किशन पुरसनानी, संदीप गुप्ता, राकेश अग्रवाल, राजेश सिंघल, राजीव गुप्ता, संजीव अग्रवाल, दिलीप कुमार, अनूप बंसल, राजेश सिंह, गोविंद राम, अशोक ललवानी, योगेश रघवानी, अंशुल अग्रवाल, अनुराग अरोड़ा, महावीर प्रसाद, साहूकार सिंह चाहर, राजीव अग्रवाल, अमित मोरियानी आदि उपस्थित रहे।
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