प्रेमानंद महाराज पर बढ़ते विवादों के बीच पं. प्रमोद गौतम का बड़ा ज्योतिषीय विश्लेषण

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धार्मिक आस्था, संतों की बढ़ती लोकप्रियता और ब्रज क्षेत्र में सामने आ रहे विवादों पर उठाए गंभीर सवाल

एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम और उनकी माताजी दिनेशवती गौतम

आगरा। वैदिक सूत्रम रिसर्च संस्था के चेयरमैन एवं विश्वविख्यात एस्ट्रोलॉजर पं. प्रमोद गौतम ने वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से जुड़े हालिया विवादों और ब्रज क्षेत्र में धार्मिक संस्थाओं एवं आश्रमों के इर्द-गिर्द उठ रहे सवालों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि धर्म और आस्था समाज की मूल शक्ति हैं, इसलिए धार्मिक संस्थाओं, संतों और उनसे जुड़े किसी भी विवाद की निष्पक्ष जांच तथा पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है।

पं. प्रमोद गौतम ने यह विचार अपनी माता एवं वैदिक सूत्रम रिसर्च संस्था की संस्थापिका, दिवंगत श्रीमती दिनेशवती गौतम की पितृ पक्ष के दौरान आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को सातवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा महिला ब्राह्मण भोज के आयोजन के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान व्यक्त किए।

रसिक दुलारी शरण की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया और टीवी पर तेज हुआ विमर्श

पं. प्रमोद गौतम ने कहा कि 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी के दिन प्रेमानंद महाराज के शिष्यों के रिहायशी आश्रम की छत से उनके गुरु-दीक्षित शिष्य रसिक दुलारी शरण की आकस्मिक मृत्यु के बाद प्रेमानंद महाराज की छवि और उनके आसपास की व्यवस्थाओं को लेकर टीवी चैनलों तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चर्चा तेज हो गई है।

उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद विभिन्न प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप और सवाल सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन गए हैं। ऐसे संवेदनशील मामलों में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

पं. गौतम का आरोप—धर्म और राजनीति के रिश्ते पर गंभीर पुनर्विचार जरूरी

पं. प्रमोद गौतम ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 में भाजपा की स्पष्ट बहुमत की सरकार बनने के बाद हिन्दू मतदाताओं को आकर्षित करने की राजनीतिक आवश्यकता के चलते धार्मिक गुरुओं, कथा वाचकों और अन्य धार्मिक व्यक्तित्वों का प्रभाव बढ़ा।

उनके अनुसार, पिछले वर्षों में ब्रज क्षेत्र में अनेक संतों, धर्मगुरुओं और कथा वाचकों की लोकप्रियता तथा प्रभाव में वृद्धि हुई है और उनमें से कुछ लोग धार्मिक आस्था के साथ-साथ धार्मिक व्यवसाय की ओर भी अग्रसर हुए हैं।

हालांकि ये पं. गौतम द्वारा व्यक्त राजनीतिक एवं सामाजिक आरोप/आकलन हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि इस आलेख में नहीं की जा रही है। उन्होंने कहा कि सत्ता में रहने वाले राजनीतिक दलों को सभी धर्मों के प्रति निष्पक्ष और समान दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

2017 और 2022 के चुनावों को लेकर अपनी ज्योतिषीय भविष्यवाणी का भी किया उल्लेख

पं. गौतम ने कहा कि वर्ष 2017 और 2022 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनने के संबंध में उन्होंने विधानसभा चुनावों से पहले राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से ज्योतिषीय भविष्यवाणी की थी।

उन्होंने कहा कि उनके ज्योतिषीय विश्लेषण राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए थे और उनके अनुसार इन चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी उनके पूर्व निर्धारित ज्योतिषीय आकलनों पर आधारित थी।

प्रेमानंद महाराज की जन्मतिथि 30 मार्च 1969 मानकर किया ज्योतिषीय विश्लेषण

वैदिक सूत्रम रिसर्च संस्था के चेयरमैन पं. प्रमोद गौतम ने प्रेमानंद महाराज की उपलब्ध जन्मतिथि के आधार पर उनकी जन्मकुंडली का ज्योतिषीय विश्लेषण भी प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि यदि प्रेमानंद महाराज की वास्तविक जन्मतिथि 30 मार्च 1969 है, तो वैदिक ज्योतिष की गणना के अनुसार उनकी चंद्र राशि सिंह बनती है और उनका जन्म मघा नक्षत्र में माना जाएगा। पं. गौतम ने मघा को गण-वर्गीकरण के संदर्भ में राक्षस गण का नक्षत्र बताते हुए स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के राक्षस गण में जन्म लेने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी भक्ति या आध्यात्मिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा सकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रावण भी राक्षस था और भगवान शिव का अनन्य भक्त माना जाता है। उनके अनुसार, ज्योतिषीय परंपरा में गण-वर्गीकरण को व्यक्ति के स्वभाव के एक पहलू के रूप में देखा जाता है, न कि उसकी धार्मिक आस्था की अंतिम कसौटी के रूप में।

राशि और शनि की स्थिति को लेकर पं. गौतम ने जताई कठिन समय की आशंका

पं. गौतम के ज्योतिषीय विश्लेषण के अनुसार वर्तमान समय में सिंह राशि पर शनि की अष्टम ढैय्या का प्रभाव 1 अप्रैल 2025 से 1 जून 2027 तक माना जा रहा है।

उन्होंने कहा कि यदि प्रेमानंद महाराज की जन्मतिथि 30 मार्च 1969 ही सही है और उनकी चंद्र राशि सिंह है, तो इस अवधि को ज्योतिषीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण माना जा सकता है। उनके अनुसार जन्मकुंडली में शनि की स्थिति तथा वर्तमान गोचर को देखते हुए स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा और विवादों से जुड़े विषयों में कठिनाइयों का दौर सामने आ सकता है।

यह निष्कर्ष पं. गौतम की ज्योतिषीय व्याख्या है, न कि किसी चिकित्सकीय या वैज्ञानिक जांच का निष्कर्ष।

आश्रमों और यमुना खादर की जमीनों पर कथित अवैध निर्माण की जांच की मांग

पं. गौतम ने आरोप लगाया कि प्रेमानंद महाराज के नाम और प्रभाव का इस्तेमाल कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से भूमि संबंधी गतिविधियों और अवैध निर्माण के लिए किया गया हो सकता है।

उन्होंने दावा किया कि वृंदावन में यमुना किनारे खादर की जमीनों पर कथित रूप से कॉलोनियों का निर्माण किया गया तथा प्रेमानंद महाराज के शिष्यों को कुटिया के नाम पर महंगे दामों में जमीन अथवा निर्माण उपलब्ध कराए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

इन आरोपों के संबंध में पं. गौतम ने उत्तर प्रदेश सरकार से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि कहीं सरकारी नियमों का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

प्रशासन की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जरूरत—पं. गौतम

पं. गौतम ने कहा कि यमुना किनारे की खादर भूमि पर किसी भी प्रकार की अनधिकृत प्लॉटिंग अथवा निर्माण की अनुमति नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार यदि ऐसी गतिविधियां हुई हैं तो यह जांच का विषय है कि स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी रही।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी राजनीतिक दल, नेता अथवा प्रशासनिक अधिकारी पर बिना प्रमाण आरोप लगाना उचित नहीं होगा, इसलिए पूरे मामले की दस्तावेजी और प्रशासनिक जांच होनी चाहिए तथा दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

जन्मकुंडली में राहु, सूर्य और बुध की युति का भी किया उल्लेख

पं. प्रमोद गौतम ने प्रेमानंद महाराज की कथित जन्मतिथि 30 मार्च 1969 के आधार पर उनकी जन्मकुंडली में सूर्य, बुध और छाया ग्रह राहु की स्थिति का उल्लेख करते हुए इसे वैदिक ज्योतिष की अपनी व्याख्या के अनुसार महा पितृ दोष और ग्रहण योग से जोड़कर देखा।

उन्होंने कहा कि ज्योतिषीय परंपरा में सूर्य को यश, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि का कारक माना जाता है तथा राहु के साथ सूर्य की स्थिति को प्रतिष्ठा और सार्वजनिक छवि से जुड़े उतार-चढ़ाव के संदर्भ में देखा जाता है।

पं. गौतम के अनुसार, इसी ज्योतिषीय संरचना के कारण प्रेमानंद महाराज को वर्तमान समय में अपनी सार्वजनिक छवि से जुड़े विवादों और आरोपों का सामना करना पड़ सकता है।

किडनी की समस्या को भी जन्मकुंडली से जोड़ने का दावा

पं. गौतम ने यह भी दावा किया कि प्रेमानंद महाराज को कम उम्र, लगभग 19 वर्ष की आयु से किडनी संबंधी समस्या रही है और उन्होंने इसे उनकी कथित जन्मकुंडली में बताए गए पितृ दोष से जोड़कर देखा।

हालांकि किसी व्यक्ति की बीमारी के कारणों का निर्धारण चिकित्सकीय जांच से ही किया जा सकता है। ज्योतिषीय व्याख्या को चिकित्सा निदान का विकल्प नहीं माना जा सकता। इस संबंध में पं. गौतम का कथन उनके ज्योतिषीय दृष्टिकोण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

मंगल की मजबूत स्थिति और भूमि संबंधी मामलों का ज्योतिषीय संबंध

पं. गौतम ने प्रेमानंद महाराज की कथित जन्मकुंडली में भूमि के कारक मंगल ग्रह के वृश्चिक राशि में स्थित होने का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्योतिषीय दृष्टि से मंगल की यह स्थिति भूमि और संपत्ति संबंधी मामलों में प्रभावशाली मानी जा सकती है।

उनके अनुसार, इसी ज्योतिषीय स्थिति को वह आश्रमों और भूमि से जुड़े घटनाक्रमों के संदर्भ में देखते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के नाम या प्रतिष्ठा का इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति द्वारा गलत गतिविधियों के लिए किया जाता है तो वास्तविक जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जिम्मेदारी किसकी है और लाभ किसे मिला।

आने वाले महीनों को लेकर पं. गौतम ने जताई अधिक चुनौती की संभावना

एस्ट्रोलॉजर पं. प्रमोद गौतम के अनुसार प्रेमानंद महाराज के लिए आने वाला समय ज्योतिषीय दृष्टि से और चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उन्होंने कहा कि 9 अक्टूबर 2026 से 8 फरवरी 2027 तक शनि ग्रह देवगुरु बृहस्पति से संबंधित मीन राशि के अंतर्गत आने वाले उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में गोचर करेगा।

उनके अनुसार सिंह चंद्र राशि पर चल रही अष्टम ढैय्या, जन्मकुंडली में शनि की स्थिति तथा राहु-सूर्य की युति को मिलाकर देखने पर स्वास्थ्य, सार्वजनिक प्रतिष्ठा और विवादों से जुड़े मामलों में सावधानी का समय बनता है।

आस्था के साथ पारदर्शिता भी जरूरी

पूरे घटनाक्रम पर पं. प्रमोद गौतम ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा अत्यंत प्राचीन और व्यापक है तथा संतों एवं आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति करोड़ों लोगों की गहरी आस्था है। इसलिए किसी भी संत से जुड़े आरोप या विवाद को न तो केवल सोशल मीडिया के आधार पर सत्य मानना चाहिए और न ही बिना जांच के खारिज कर देना चाहिए।

उनके अनुसार, आस्था की रक्षा का सबसे मजबूत रास्ता पारदर्शिता, कानून का पालन और निष्पक्ष जांच है। यदि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप गलत हैं तो जांच से उसकी छवि और प्रतिष्ठा भी मजबूत होगी और यदि कोई अनियमितता सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकेगी।

2027 से पहले निष्पक्ष जांच की मांग

पं. प्रमोद गौतम ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की कि वृंदावन में यमुना खादर की जमीनों पर कथित निर्माण, प्लॉटिंग, आश्रमों की गतिविधियों तथा प्रेमानंद महाराज के शिष्यों से जुड़े विवादों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

उन्होंने कहा कि किसी भी जांच का उद्देश्य किसी संत या धार्मिक संस्था को बदनाम करना नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाना और कानून का शासन सुनिश्चित करना होना चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि यदि किसी भी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी या अवैध निर्माण प्रमाणित होता है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले किए जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: संतों की प्रतिष्ठा और श्रद्धालुओं का विश्वास—दोनों की रक्षा जरूरी

प्रेमानंद महाराज से जुड़ा यह पूरा विवाद केवल किसी एक संत या संस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह धर्म, आस्था, सार्वजनिक जीवन, प्रशासनिक पारदर्शिता और कानून के पालन से जुड़े व्यापक प्रश्न भी सामने रखता है।

पं. प्रमोद गौतम का ज्योतिषीय विश्लेषण अपनी जगह है, लेकिन किसी भी आरोप या विवाद का अंतिम निर्णय तथ्यात्मक जांच और कानून के आधार पर ही होना चाहिए। संतों और धार्मिक संस्थाओं के प्रति करोड़ों लोगों की आस्था को देखते हुए यह आवश्यक है कि ऐसे मामलों में अफवाहों के बजाय प्रमाण सामने आएं और जांच निष्पक्ष हो।

आस्था तभी मजबूत होती है, जब उसके साथ सत्य, पारदर्शिता और जवाबदेही भी खड़ी हो।

डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक

Dr. Bhanu Pratap Singh