आगरा में सिकंदरा मस्जिद से गूंजा इंसानियत का संदेश

RELIGION/ CULTURE

सिकंदरा मस्जिद से गूंजा इंसानियत का संदेश

ख़तीब मुहम्मद इक़बाल ने जुमे के खुत्बे में बाढ़ त्रासदी पर जताई गहरी चिंता

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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.

आगरा। नहर वाली सिकंदरा मस्जिद के ख़तीब मुहम्मद इक़बाल ने शुक्रवार के जुमे के खुत्बे में उत्तर भारत में आई भीषण बाढ़ पर चिंता प्रकट की और लोगों से आह्वान किया कि इस विपत्ति की घड़ी में वे एक-दूसरे का सहारा बनें।

‘तूफान-ए-नूह’ जैसी स्थिति

ख़तीब ने बाढ़ की भयावहता को ‘तूफान-ए-नूह’ की संज्ञा देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, पंजाब और दिल्ली तक पानी ही पानी है, जिसने इंसान और जानवर सभी को अपनी चपेट में ले लिया है। उनके अनुसार जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे दिल दहला देने वाले और रूह को झकझोरने वाले हैं।

मानव की भूलें और प्रकृति का प्रतिशोध

मुहम्मद इक़बाल ने इस आपदा के कारणों पर आत्ममंथन करते हुए कहा— “अगर ईमानदारी से जायजा लें, तो क़ुसूरवार हम ही निकलेंगे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि इंसान ने अपने स्वार्थ में पहाड़ों की गोद में ऐसे निर्माण और कार्य किए जिनसे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया। आज इसका दुष्परिणाम जम्मू से लेकर दिल्ली और आगरा तक दिख रहा है।

समाज की स्वार्थपरता पर प्रश्नचिह्न

उन्होंने सवाल उठाया— “क्या हम इस बड़े हादसे से कोई सबक लेंगे? मुझे नहीं लगता!” ख़तीब के अनुसार, समाज में स्वार्थपरता और दूसरों के प्रति उदासीनता इतनी बढ़ चुकी है कि सामूहिक चेतना कमज़ोर हो रही है, जो हर आपदा को और विकराल बना देती है।

मानवीय संवेदनाओं का आह्वान

मुहम्मद इक़बाल ने पंजाब का उदाहरण देते हुए कहा कि “पंजाब के लोग हमेशा दूसरों की मदद के लिए आगे रहते हैं, आज खुद मुसीबत में हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में हमारी जिम्मेदारी है कि हम सब उनकी मदद को आगे बढ़ें। हर कोई अपनी हैसियत के मुताबिक योगदान दे।”

राहत कार्य की सराहना और दुआ

उन्होंने राहत कार्य में जुटे स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों की सराहना की और अल्लाह से दुआ की कि वह इस कठिन घड़ी में सब पर रहमत बरसाए और पीड़ितों को इस विपदा से उबारे।

संपादकीय

मुहम्मद इक़बाल का जुमे का यह खुत्बा न केवल एक धार्मिक संदेश था, बल्कि सामाजिक चेतना का भी आह्वान था। बाढ़ जैसी आपदाएँ केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि हमारी गलतियों की उपज भी हैं। पहाड़ों का दोहन, नदियों के रास्ते रोकना और अंधाधुंध विकास, इन सबने हमें इस संकट तक पहुँचाया है।

आज जरूरत है कि हम केवल दुआ और चर्चा तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस कदम उठाएँ। पीड़ितों की मदद करना हमारी नैतिक और इंसानी जिम्मेदारी है। अगर हम इस आपदा से सबक लेकर प्रकृति के साथ संतुलन बनाएँ और मानवीय मूल्यों को जगाएँ, तभी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और संवेदनशील समाज दे सकेंगे।

डॉ भानु प्रताप सिंह

Dr. Bhanu Pratap Singh