कुमार विश्वास की दोटूक: प्रशासन संतों से बात करते वक्त मर्यादा न भूले…शंकराचार्य जी भी अपना “सात्विक क्रोध” त्यागें और सभी पर कृपा बनाए

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मुरादाबाद। मुरादाबाद में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम ‘उदिशा’ में शामिल होने पहुंचे कवि कुमार विश्वास ने जिगर मुरादाबादी फाउंडेशन के अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय शायर मंसूर उस्मानी के घर जाकर शोक संवेदना व्यक्त की। हाल ही में एक हादसे में मंसूर उस्मानी की बेटी का निधन हो गया था। कुमार विश्वास ने परिवार से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया और इस दुख की घड़ी में साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया

इसके बाद मीडिया से बातचीत में कुमार विश्वास ने शंकराचार्य विवाद और हिंदी भाषा को लेकर तमिलनाडु सीएम एमके स्टालिन के बयान पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी।

शंकराचार्य विवाद पर बोले- संवाद में मर्यादा जरूरी

कुमार विश्वास ने कहा कि वे एक सामान्य आस्तिक हैं और पूज्य शंकराचार्य के विषय में टिप्पणी करने की सामर्थ नहीं रखते। उन्होंने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि प्रशासन को संत परंपरा से जुड़े व्यक्तियों से संवाद करते समय संवेदनशीलता, मर्यादा और जिम्मेदारी का भाव रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिसने अपना जीवन धर्म और संस्कृति को समर्पित कर दिया हो, उससे बात करते वक्त विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। कुमार विश्वास ने यह भी कहा कि वे शंकराचार्य से भी प्रार्थना करेंगे कि वे अपना “सात्विक क्रोध” त्यागें और सभी पर कृपा बनाए रखें।

उन्होंने कहा कि यदि कहीं कोई गलती हुई है, तो देश के नागरिक होने के नाते क्षमा प्रार्थना करते हैं और शंकराचार्य से सभी के मंगल के लिए आशीर्वाद देने का अनुरोध करते हैं।

एमके स्टालिन के हिंदी बयान पर प्रतिक्रिया

एमके स्टालिन के हिंदी भाषा को लेकर दिए गए बयान पर कुमार विश्वास ने कहा कि जिनके पिता का नाम “करुणानिधि” रहा हो, और जिनके घर में राम नाम की परंपरा जुड़ी हो, उनके द्वारा भगवान राम की भाषा पर इस तरह की टिप्पणी करना दुखद है।

उन्होंने कहा कि तमिल एक अद्भुत भाषा है, उसका प्रचार-प्रसार होना चाहिए और हर भारतीय यही चाहेगा, लेकिन किसी एक भाषा का विरोध नहीं होना चाहिए।

कुमार विश्वास ने इसे राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि भाषा विरोध का यह मुद्दा एक तरह का राजनीतिक कौशल है, जिसका बीज आजादी के बाद से बोया गया और अब इसे जानबूझकर बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने हिंदी भाषी लोगों से भी अपील की कि वे दक्षिण भारत के विद्वानों को पढ़ें और भाषा के नाम पर दूरी न बढ़ाएं।

Dr. Bhanu Pratap Singh