बंशीवट में आज भी सुन सकते हैं कान्हा की बांसुरी की तान
Mathura (Uttar Pradesh, India)। बृज के कण- कण में भगवान कृष्ण का वास है। ये भूमि कृष्ण की उन लीलाओं की साक्षी है। तभी तो हम जो आपको बताने जा रहे है जिसे सुनने के बाद शायद आपको इस बात पर यकीन न हो। क्या भला पेड़ों से भी बाँसुरी या ढोलक की आवाज सुनाई दे सकती है। लेकिन ये बिल्कुल सच है।
वट वृक्ष में दिव्य ऊर्जा उत्पन्न हुई
मथुरा से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित मांट इलाके में बंशीवट नामक स्थान है। कुछ लोग इसे बंसीबट भी कहते हैं। जहाँ भगवान कृष्ण अपनी गाय चराने जाते थे। गायों को बुलाने के लिए एक पेड़ पर बैठकर बाँसुरी बजाते थे। कान्हा की बाँसुरी की धुन सुनकर गाय यहाँ आ जाया करती थी । ये पेड़ देखने में आम पेड़ों की तरह है लेकिन जब इस पेड़ से कान लगाकर ध्यान से सुना जाता है तो इसमें से तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती हैं। माना जाता है कि इस वृक्ष पर कृष्ण भगवान चढ़कर बाँसुरी बजाते थे तो इस पेड़ में दिव्य ऊर्जा उत्पन्न हुई और उसी की वजह से इससे आज भी बाँसुरी की वही मधुर तान सुनाई देती है।
वट वृक्ष में से राधे-राधे की आवाजः हरिदास
मध्य प्रदेश से दर्शन करने आए हरिदास नाम के श्रद्धालु ने बताया कि हमने बहुत सुना था कि इस वट वृक्ष में से आवाज आती है। मन में बहुत दिन से यह अभिलाषा थी कि उस वट वृक्ष को देखा जाए जिस वटवृक्ष में से बंसी और ढोलक की आवाज आती है। आज सौभाग्य मिला इस वटवृक्ष के दर्शन का। इस वट वृक्ष में से राधे-राधे की आवाज आती है। यह भगवान की लीला है। यहां आकर ऐसा लग रहा है जिंदगी यही बिता दूं। जो कभी कल्पना नहीं की गई कि ऐसा आनंद यहां आने पर मिलेगा।
पेड़ से आवाज आ रही हैः भगवान दास
श्रद्धालु भगवान दास ने बंशीवट के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि यह वह स्थान है जहां भगवान श्री कृष्ण ने बाल अवस्था में गायों को चराया और इसी वटवृक्ष के ऊपर बैठकर बंसी बजाई। वट वृक्ष से कान लगाकर खड़े हो जाओ आपको इसमें से आवाज सुनाई देंगी। पेड़ में से आवाज आना पहले कभी नहीं सुना। जब हम बंशीवट आए तो यहां देखा के पेड़ में से आवाज आ रही है।
ऊर्जा मापक यंत्र भी दे चुके हैं प्रमाणः महंत
बंशीवट के महंत जयराम दास ने बताया कि कई बार इस वट वृक्ष की मशीनों के द्वारा जाँच कराई गयी है। ऊर्जा मापक यंत्रों ने भी इस वट वृक्ष में आज भी वो ऊर्जा है जिसके कारण आवाज आती है। ये कहने में बिलकुल भी संकोच नहीं होता कि भगवान आज भी इस पेड़ में है।
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