LSE से ग्रेजुएशन और स्पेन की नौकरी छोड़कर दिज़ा ने थामा सुरों का दामन, संगीत से लिख रही हैं नई कहानी

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मुंबई (अनिल बेदाग): जिंदगी में कुछ सपने कॉर्पोरेट की सुरक्षित और आरामदायक नौकरियों से कहीं ज्यादा बड़े होते हैं, और कुछ आवाज़ें सीधे दिल की गहराइयों से निकलकर अपनी मंजिल खुद तय करती हैं। युवा गायिका दिज़ा सक्सेना की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद स्पेन में अपने कॉर्पोरेट करियर की शुरुआत करने वाली महज 22 वर्षीय दिज़ा ने अचानक अपनी जिंदगी की दिशा बदलने का बड़ा फैसला लिया और कॉरपोरेट जगत को छोड़कर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को ही अपना मुख्य भविष्य बना लिया।

अपने अब तक के सफर के बारे में बात करते हुए दिज़ा बताती हैं कि पिछले आठ वर्षों की कड़ी शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग ने उन्हें वह मजबूत आधार दिया है, जिसके दम पर आज वह संगीत की दुनिया में अपनी एक स्वतंत्र और अलग पहचान गढ़ रही हैं। हाल ही में मुंबई में आयोजित ‘बैठो ना’ संगीत संध्या के माध्यम से उन्होंने सेमी-क्लासिकल, गज़ल, उर्दू शायरी और मॉडर्न म्यूजिक का एक ऐसा अद्भुत मेल पेश किया, जिसमें जहां एक तरफ हमारी समृद्ध परंपरा की खुशबू थी, तो वहीं दूसरी तरफ Gen Z (जेन-जी) पीढ़ी की ताजगी और आधुनिकता भी साफ झलक रही थी।

सदाबहार गानों से जीता संगीतप्रेमियों का दिल

इस लाइव कॉन्सर्ट के दौरान दिज़ा ने ‘लग जा गले’, ‘इन आँखों की मस्ती के’, दिवंगत गज़ल सम्राट जगजीत सिंह को एक भावभीनी श्रद्धांजलि तथा अमीर खुसरो की मशहूर रचना ‘छाप तिलक सब छीनी रे’ जैसी बेहतरीन प्रस्तुतियां देकर वहां मौजूद सभी संगीतप्रेमियों का दिल जीत लिया। उनकी गायकी का यह अंदाज श्रोताओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ गया।

ग्लोबल एक्सपोजर और संगीत का सफर

खास बात यह है कि दिज़ा सक्सेना केवल एक प्रतिभावान गायिका ही नहीं, बल्कि एक वल्र्ड ट्रैवलर भी हैं। वह अब तक दुनिया के पांच अलग-अलग देशों में रह चुकी हैं और 50 से अधिक देशों की यात्रा कर चुकी हैं। दुबई की पारंपरिक घरेलू महफिलों से लेकर मायानगरी मुंबई के प्रतिष्ठित मंचों तक का सफर तय करने वाली दिज़ा अब भारतीय संगीत को वैश्विक फलक पर एक नई पहचान देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को संभालते हुए उसे आज की युवा भाषा और अंदाज में लोगों तक पहुंचाना ही संगीत की असली खूबसूरती है।




Dr. Bhanu Pratap Singh