डॉ. भानु प्रताप सिंह
उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कड़ी है व्यापारी। वही व्यापारी जो हर किसी के लिए ‘सॉफ्ट टारगेट’ है। मैं ऐसे अनेक व्यापारियों को जानता हूँ जो व्यापार न चलने का रोना रोते रहते हैं, लेकिन इनके यहां जब वस्तु सेवा कर (जीएसटी), आयकर या प्रवर्तन निदेशालय का छापा पड़ता है तो करोड़ों रुपये नकद और करोड़ों रुपये की अघोषित संपत्ति मिलती है। कन्नौज, कानपुर और आगरा में हुई छापामारी इसका उदाहरण है। यही कारण है कि आमतौर पर व्यापारी के प्रति किसी की धारणा ठीक नहीं है। कुछ व्यापारी हैं जो जमकर टैक्स की लूट करते हैं और बदनाम समस्त व्यापारी होते हैं। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, व्यापारी रोते ही रहते हैं। इस आलेख को लिखने से पहले मैंने कई छोटे बड़े व्यापारियों, निर्यातकों, उत्पादक, सनदी लेखाकार (अंग्रेजी में चार्टर्ड अकाउंटेंट), आयकर अधिवक्ता, कंपनी सचिवों से बातचीत की। बातचीत का जो निष्कर्ष निकला है, उसे सरल शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ।
इस समय व्यापारी परेशान है वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.) की बढ़ती दरों से। व्यापारियों का तर्क है कि जी.एस.टी. बढ़ने से उत्पाद का मूल्य बढ़ जाता है, खरीदारी कम हो जाती है, जिसका दुष्प्रभाव लाभांश पर पड़ता है। यह भी कहना है कि कुछ लोग नेतागीरी के लिए हो-हल्ला करते हैं। जीएसटी तो उपभोक्ता देता है, व्यापारी नहीं। तीसरा तर्क यह आया कि व्यापारी सरकार को जी.एस.टी. का भुगतान अग्रिम करता है और विवरणी (रिटर्न) दाखिल करता है। इसके बाद सरकार वापस करती है, जिसमें एक साल तक लग जाता है। चौथी बात यह सामने आई कि ‘नम्बर दो’ का काम करने वाले व्यापारी ही जी.एस.टी. की बढ़ती दरों से परेशान होते हैं। यह कौन नहीं जानता है कि जी.एस.टी. के नाम पर व्यापारी किस तरह से घालमेल कर रहे हैं। घरेलू व्यापार आधा भी ‘नम्बर एक’ में नहीं हो रहा है। निष्कर्ष यह निकला है कि व्यापारी जी.एस.टी. में घालमेल करने के लिए मजबूर है। सरकार ने तो जीएसटी पहले ले ली, अगर माल नहीं बिका तो उसका पैसा सरकार पर फँस गया। जो माल कालातीत (एक्सपायर) हो गया, उसका जी.एस.टी. भी मारा गया। महीने में दो बार जी.एस.टी. विवरणी प्रस्तुत करनी होती है, भले ही एक धेले की बिक्री न हो। यह भी श्रम साध्य कार्य है। जिनके पास जी.एस.टी. नम्बर है और व्यापार नहीं कर रहे हैं, उन्हें भी विवरणी तो प्रस्तुत करनी ही पड़ेगी। सुझाव यह दिया गया है कि सरकार उत्पादनकर्ता पर ही जी.एस.टी. लगा दे। व्यापारी पहले उपभोक्ता से जी.एस.टी. लेता है और फिर सरकार से वापस लेने के लिए माथापच्ची करता है। उत्पादनकर्ता पर जी.एस.टी. लगने से लेने-देने और विवरणी प्रस्तुत करने के झंझट से मुक्ति मिल जाएगी। यह कोई नया सुझाव नहीं है। केन्द्रीय वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली को भी दिया गया था, लेकिन उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया।
जी.एस.टी. की प्रक्रिया ऑनलाइन होने के बाद भी विभागीय अधिकारियों से पीछा नहीं छूटा है। छोटी-मोटी कमियां निकालकर व्यापारी को धमकाते हैं। व्यापार बंद होने के डर से जी.एस.टी. अफसरों की ‘सेवा’ करनी ही पड़ती है। सेवा नहीं करे तो छापा मारकर सरेआम बेइज्जती कर देते हैं। व्यापार के सिलसिले में माले ले जा रहे व्यापारी को जी.एस.टी. अधिकारी सीधे-सीधे ‘लूट’ लेते हैं। मथुरा के व्यापारी के साथ यह घटना हो चुकी है। पुलिस ने इस लूट की की कोई रिपोर्ट ही नहीं लिखी। जब राजनीतिक दबाव पड़ा तो रिपोर्ट दर्ज हुई और लुटेरे जी.एस.टी. अफसरों को जेल। इस लूट से यह भी खुलासा हुआ कि हर अधिकारी ने अपने साथ निजी कर्मचारी रखे हुए हैं, जो लूट के मुख्य सूत्रधार होते हैं। अगर ये अधिकारी केवल वेतन पर निर्भर होते तो अपने साथ निजी कर्मचारी लेकर नहीं चलते। सबसे पहले तो इन जी.एस.टी. अफसरों के यहां आयकर छापा पड़ना चाहिए। हकीकत यह है कि जो पैसा सरकार को मिलना चाहिए, वह जी.एस.टी. अधिकारी हड़प ले जाते हैं।
सरकार की यह सोच भी अजीब है कि टैक्स बढ़ जाएगा तो आय बढ़ जाएगी। जितनी भी जीएसटी ली जाती है, वह अंततः व्यापारी के पास वापस आ जाती है। ऐसे में सरकार को इससे क्या लाभ हुआ? उल्टे व्यापारी का प्रारंभिक पूंजीनिवेश बढ़ गया, भले ही माल कई साल तक न बिके। सुझाव आया है कि पूरे देश में प्रत्येक वस्तु का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) समान कर दी जाए। एक राष्ट्र-एक टैक्स की नीति लागू हो ताकि अन्य राज्यों से हेराफेरी न हो सके। पेट्रोल-डीजल का मूल्य भी हर राज्य में समान हो। एक ही वस्तु पर केन्द्र और राज्य अलग-अलग टैक्स लेते हैं, जिससे मूल्य में अंतर रहता है और तस्करी को बढ़ावा मिलता है।
(यह आलेख वरिष्ठ आयकर अधिवक्ता अनिल वर्मा, सीए रवि मल्होत्रा, जूता निर्यातक राज कुमार जैन, व्यापारी महीपाल यादव आदि से बातचीत पर आधारित है)
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