देवभूमि का दर्द: विकास के नाम पर विनाश….वरना अगली आपदा आपके दरवाज़े पर होगी…

डॉ सत्यवान सौरभ उत्तरकाशी के थराली में बादल फटने से हुई भीषण तबाही उत्तराखंड के पर्यावरणीय संकट की गंभीर चेतावनी है। विकास के नाम पर हो रही पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, अवैज्ञानिक निर्माण और बेतरतीब पर्यटन ने पहाड़ों की सहनशीलता को खत्म कर दिया है। जमीन की लूट, संस्कृति का क्षरण और लगातार बढ़ता तापमान, […]

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चाइनीज मांझा: कार्यवाई का शोर और खुलेआम बिकती मौत की डोर

डॉ सत्यवान सौरभ चाइनीज मांझा, जो नायलॉन और धातु से बना अत्यंत तीव्र धार वाला धागा है, आज पतंगबाज़ी से कहीं अधिक जानलेवा साबित हो रहा है। यह मांझा इंसानों और पक्षियों दोनों के लिए खतरनाक है, जिससे हर वर्ष कई दुर्घटनाएं होती हैं। गर्दन और चेहरे पर गहरे कट, पक्षियों की मृत्यु, और सड़क […]

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एक बार विधायक, उम्रभर ऐश: 5 साल की कुर्सी बनाम 60 साल की नौकरी… पेंशन का पक्षपात

डॉ सत्यवान सौरभ एक कर्मचारी 60 साल काम करने के बाद भी पेंशन के लिए तरसता है, जबकि एक नेता 5 साल सत्ता में रहकर जीवनभर पेंशन पाता है। यह लोकतांत्रिक समानता के मूल्यों का मज़ाक है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई गई है। अब वक्त है कि […]

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“ट्रांसफर फाइलें धूल फांक रही हैं: सरकार की मंशा सवालों के घेरे में”

“शिक्षक इंतज़ार में, सरकार इनकार में: क्या ट्रांसफर सिर्फ चुनावी औजार है?” “शिक्षक ट्रांसफर नीति: मंशा है या महज दिखावा?”, “नीति, नीयत और नजरअंदाजी: हरियाणा में शिक्षक बनाम सिस्टम” डॉ सत्यवान सौरभ हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर नीति वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है, जबकि सरकार ने CET परीक्षा मात्र एक महीने में आयोजित करवा […]

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हरियाली तीज: परंपरा की जड़ें और आधुनिकता की डालियाँ

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार हरियाली तीज केवल श्रृंगार, झूला और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री के आत्मबल, प्रेम और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। आधुनिकता की दौड़ में यह त्योहार भले ही प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा हो, पर इसकी आत्मा अब भी स्त्री के मन, पर्यावरण और […]

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पीछे नहीं, बराबरी में: केरल के स्कूलों की नई बैठने की व्यवस्था एक क्रांतिकारी कदम

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार भारत के शिक्षा तंत्र में दशकों से एक अदृश्य रेखा बनी रही है — आगे की बेंच और पीछे की बेंच। जहाँ आगे की बेंच पर बैठने वाले छात्र अक्सर “मेधावी” माने जाते हैं, वहीं पीछे की बेंच को उपेक्षा और उपहास का प्रतीक समझा जाता है। लेकिन […]

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“डेटा की दलाली और ऋण की रेलमपेल : निजी बैंकों का नया लोकतंत्र”

“नमस्ते महोदय/महोदया, क्या आप व्यक्तिगत ऋण लेना चाहेंगे?” प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार कभी दोपहर की झपकी के बीच, कभी सभा के समय, कभी मंदिर के बाहर, तो कभी वाहन चलाते समय — यह स्वर अब हमारे जीवन की अनिवार्य पृष्ठभूमि बन चुका है।यह मात्र एक स्वर नहीं, बल्कि एक कृत्रिम उत्पीड़न है […]

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जब शिक्षा डर बन जाए: डिग्रियों की दौड़ में दम तोड़ते सपने, संभावनाओं की कब्रगाह बनते संस्थान

संस्थाएं डिग्रियां नहीं, ज़िंदगियां दें — तभी शिक्षा का अर्थ है प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार भारत में शिक्षा संस्थान अब केवल डिग्रियों की फैक्ट्री बनते जा रहे हैं, जहां बच्चों की संभावनाएं और संवेदनाएं दोनों दम तोड़ रही हैं। कोटा, हैदराबाद, दिल्ली जैसे शहर आत्महत्या के आंकड़ों से दहल रहे हैं। यह […]

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आस्था का ‘बाजार’ और पुलिस का ‘तमाशा’: क्या धर्मांतरण ही अब उत्तर प्रदेश की नई पहचान है?

लखनऊ/आगरा: छांगुर बाबा का नाम अब इतिहास के पन्नों में दबने लगा है, लेकिन उनके नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां ‘धर्मांतरण’ का धंधा पूरे जोर-शोर से फल-फूल रहा है। और इस बार तो कमाल ही हो गया! पुलिस बता रही है कि यह गैंग […]

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साध्वी बनने का नया ट्रेंड: त्याग की ओट में सुख का ब्रांड?

प्रियंका सौरभ स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री और व्यंग्यकार बचपन में हम सुनते थे कि साध्वी वह होती है जो मोह, माया, श्रृंगार, आकर्षण और सांसारिक जिम्मेदारियों से ऊपर उठ गई हो। वह जो खुद को समर्पित कर दे — ध्यान, साधना और आत्मा के शुद्धिकरण के लिए। आज की दुनिया में जब हम ‘साध्वी’ शब्द सुनते […]

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