पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात बिछी: सत्ता बचाने की जुगत में ‘आप’, तो वापसी के लिए कांग्रेस और विस्तार में जुटी भाजपा

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चंडीगढ़: उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ सीमावर्ती राज्य पंजाब में भी वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां अभी से तेज होने लगी हैं। सूबे की राजनीतिक बिसात पर मोहरे बिछने शुरू हो गए हैं, जहाँ एक तरफ सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) अपने शासन और विकास कार्यों के दम पर सत्ता में दोबारा वापसी की तैयारी में जुटी है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सत्ता की कुर्सी पर वापसी के लिए अपनी रणनीति को धार दे रही है।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) राज्य में अपने राजनीतिक आधार का विस्तार करने की कोशिश कर रही है, जबकि शिरोमणि अकाली दल (SAD) के सामने अपने खोए हुए राजनीतिक वजूद को फिर से मजबूत करने की बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है। इसके अलावा, भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठजोड़ की चर्चाओं ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।

‘आप’ के सामने सरकार के कामकाज और सुशासन की परीक्षा

​मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार के लिए वर्ष 2027 का यह चुनाव उसके पिछले पांच वर्षों के रिपोर्ट कार्ड की सीधी परीक्षा होगा। पार्टी को अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं, बिजली-पानी के मोर्चे पर किए गए कार्यों और मजबूत होते संगठनात्मक नेटवर्क के बल पर एक बार फिर से जनादेश हासिल करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। हालांकि, विपक्षी दल लगातार कानून-व्यवस्था की स्थिति, बढ़ते नशे के कारोबार और सरकार द्वारा पूरे किए गए वादों के आधार पर सत्तारूढ़ दल को घेरने की जोरदार तैयारी कर रहे हैं।

​कांग्रेस की रणनीति: बिखरे संगठन को एक करना और गुटबाजी से निपटना

​मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से अपनी खास चुनावी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। पार्टी का मुख्य जोर जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने और अपने परंपरागत जनाधार को एकजुट करने पर है। हालांकि, कांग्रेस के सामने स्थानीय नेताओं के बीच चल रही आपसी खींचतान और गुटबाजी को दूर करना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। जानकारों का मानना है कि उम्मीदवारों के चयन के दौरान स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ और क्षेत्रीय समीकरण कांग्रेस के लिए गेमचेंजर साबित हो सकते हैं।

भाजपा का अकेले लड़ने का दावा, पर अकाली दल से गठबंधन की अटकलें तेज

​भारतीय जनता पार्टी ने आधिकारिक तौर पर पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक धार देने के साथ-साथ ग्रामीण अंचलों और अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के बीच अपनी पैठ बढ़ाने में जुटी है।

​इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल (बादल) के बीच पुराने गठबंधन की संभावित बहाली को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। उल्लेखनीय है कि दोनों दलों का पुराना तीन दशक पुराना गठबंधन वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के चलते टूट गया था।

वर्तमान में भाजपा के सार्वजनिक रुख और अंदरखाने चल रही चर्चाओं के बीच चुनाव से पहले अंतिम तस्वीर क्या होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

​अकाली दल के सामने अस्तित्व और आधार बचाने की चुनौती

सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाला शिरोमणि अकाली दल अपने राजनीतिक प्रभाव को पुनर्जीवित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी ओर, अकाली दल से अलग हुए विभिन्न पुनर्सुरजीत गुट भी चुनाव से पहले आपसी तालमेल या नए गठजोड़ के विकल्प तलाश रहे हैं। इन अलग-अलग पंथक और क्षेत्रीय गुटों के बीच यदि चुनावी तालमेल बनता है या वे अलग-अलग मैदान में उतरते हैं, तो यह पंजाब के परंपरागत चुनावी समीकरणों को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है। फिलहाल किसी भी बड़े और व्यापक गठबंधन पर अंतिम मुहर नहीं लगी है।

​छोटे दलों की भूमिका और बहुकोणीय मुकाबला

पंजाब की सियासत में कई क्षेत्रीय और छोटे दल भी अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की फिराक में हैं। ऐसे दलों के लिए सही समय पर गठबंधन, सीटों का प्रभावी बंटवारा और प्रभावशाली चेहरों का चयन अहम होगा। जानकारों का मानना है कि इन क्षेत्रीय ताकतों के मैदान में उतरने से कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है, जो बड़े दलों के समीकरण बिगाड़ सकता है।

​इन तीन बड़े सवालों पर टिकी हैं सबकी नजरें

​फिलहाल पंजाब की चुनावी आबोहवा में तीन सबसे बड़े सवाल सबसे ऊपर तैर रहे हैं । ​क्या भाजपा और अकाली दल एक बार फिर पुराना गठबंधन कर हाथ मिलाएंगे? ​क्या कांग्रेस पार्टी चुनाव से पहले अपनी आंतरिक गुटबाजी को पूरी तरह समाप्त कर पाएगी? क्या ‘आप’ सरकार अपने प्रशासनिक कामकाज और विकास के दम पर दोबारा जनता का समर्थन जुटाने में सफल होगी?

​इन सभी सवालों के संतोषजनक जवाब, सही समय पर होने वाले उम्मीदवारों के चयन और ऐन वक्त पर बनने वाले राजनीतिक गठबंधनों से ही 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की वास्तविक तस्वीर तय होगी। वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी दल की जीत या हार का निश्चित निष्कर्ष निकालने के बजाय सभी दलों की तैयारियों और तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम पर पैनी नजर रखना ही उचित होगा।

Dr. Bhanu Pratap Singh