आगरा। नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा द्वारा 31 जुलाई को “प्रेमचन्द जयन्ती समारोह” का आयोजन ‘सभा भवन’ में किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा सी०एम०डी०, सेंट एंड्रयूज़ ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूशनने कहा “मुंशी प्रेमचन्द भारत के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं, जिनके युग का विस्तार सन 1880 से 1936 तक रहा है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व रखता है। इस युग में भारत का स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई भी नई मंजिलों से गुजरी थी।”
मुख्य वक्ता प्रो. उमापति दीक्षित, विभागाध्यक्ष, सायंकालीन पाठ्यक्रम विभाग, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) ने कहा कि “प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में अभिव्यक्त हुई है। वह बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार थे। वह दरिद्र नहीं थे, संपन्न थे, लेकिन दरिद्रो के दर्द को बड़ी ही शिद्दत से महसूस करते हुए उन्होंने साहित्य को कमजोर और बेसहारा वर्ग की आवाज़ बनाया। प्रेमचन्द की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। विश्व साहित्य के क्षितिज पर हिंदी साहित्य को सम्मानजनक स्थान दिलाने वाले प्रेम चंद को भारत का टॉलस्टाय कहा जाने लगा था। उनके साहित्य को पूरी दुनिया में अनुवादित कर पढ़ा गया।”
समारोह के अध्यक्ष और सभा के सभापति डॉ० खुगीराम शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “जिस युग में प्रेमचन्द ने कलम उठाई थी, उस समय उनके पीछे ऐसी कोई ठोस विरासत नहीं थी और न ही विचार और न ही प्रगतिशीलता का कोई मॉडल ही उनके सामने था, सिवाय बांग्ला साहित्य के।”
समारोह में वरिष्ठ कवि रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी ने भी विचार व्यक्त करते हुए मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व के कई पहलुओं पर प्रकाश डाला। समारोह का सफल संचालन करते हुए सभा की उप सभापति प्रो. कमलेश नागर ने कहा कि “प्रेमचन्द ने अपने जीवन में कई अद्भुत कृतियों लिखी हैं। तब से लेकर आज तक हिन्दी साहित्य में न ही उनके जैसा हुआ है, और न ही कोई और होगा।” सभा के मंत्री प्रो० चन्द्र शेखर शर्मा ने अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा “प्रेमचन्द से पहले, हिंदी कथा साहिल में अक्सर राजाओं, रानियों, तिलिस्म और कल्पनालोक का प्रभाव दिखाई देता था। प्रेमचन्द ने कहानी लेखन का ट्रेंड ही बदल दिया। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य का सबसे बड़ा मथार्थवादी लेखक माना जाता है।
शुरू में डॉ.शशि तिवारी ने सरस्वती वंदना का पाठ किया। डॉ० ब्रज बिहारी बाल वर्मा ‘बिरजू ने अतिथियों स स्वागत किया। मुख्य वक्ता प्रो. उमापति दीक्षित का परिचय डॉ.मधु भारद्वाज ने दिया। मुख्य अतिथि डॉ.गिरधर शर्मा का परिचय डॉ. विनोद माहेश्वरी ने दिया।
इस अवसर पर प्रो. आभा चतुर्वेदी, डॉ० नीलम भटनागर, डॉ. मधुरिमा शर्मा, डॉ. हरबंस पाण्डेय, रमेश पंडित, डॉ० महेश धाकड़, नन्द नंदन गर्ग, ओम स्वरूप गर्ग, लखमीचंद, शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ, शरद गुप्त, रामेंद्र शर्मा रवि, शैल अग्रवाल, नूतन अग्रवाल, सपना सिंह, मनीष सिंह, हेमन्त कुमार द्विवेदी, प्रकाश गुप्ता, शीलेंद्र वर्मा, डॉ. यशोयश, प्रकाश चंद्र अग्रवाल, खुशी सिंह, उमा शंकर पाराशर आदि मौजूद रहे।
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