जब जिला जेल आगरा की दीवारों में गूंजा राम नाम… ‘हनुमान अंश’ की स्टारकास्ट ने कैदियों संग किया संकीर्तन

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जब जेल की दीवारों में गूंजा राम नाम… ‘हनुमान अंश’ की स्टारकास्ट ने कैदियों संग किया संकीर्तन

फिल्म कलाकारों ने कैदियों से साझा किए अनुभव, आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवन की राह अपनाने का दिया संदेश

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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.

आगरा। आमतौर पर जहां जेल की ऊंची दीवारें बंदियों और बाहरी दुनिया के बीच दूरी का प्रतीक होती हैं, वहीं गुरुवार को आगरा जिला जेल का वातावरण भक्ति, संगीत और सकारात्मक ऊर्जा से भर उठा। नीम करोली बाबा के जीवन और उनके राम नाम, सेवा एवं मानवता के संदेश से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ की स्टारकास्ट जिला जेल पहुंची और निरुद्ध बंदियों के साथ आत्मीय संवाद करते हुए उन्हें जीवन में सकारात्मक बदलाव का संदेश दिया। कलाकारों ने कैदियों के साथ राम नाम का संकीर्तन भी किया, जिससे कुछ समय के लिए पूरा जेल परिसर भक्तिमय हो उठा।

कैदियों से कहा—अतीत नहीं, भविष्य बदलने पर दें ध्यान

फिल्म की टीम ने कैदियों से कहा कि मनुष्य से गलती हो सकती है, लेकिन गलती के बाद स्वयं को बदलने का अवसर भी जीवन देता है। आत्मचिंतन, सेवा, प्रेम और सकारात्मक सोच के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है।

कलाकारों ने उन्हें राम नाम, सेवा और मानवता से जुड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया। संवाद का उद्देश्य कैदियों में निराशा के स्थान पर आशा और अपराधबोध के स्थान पर आत्मसुधार की भावना जगाना रहा।

फिल्म की स्टारकास्ट ने खोले शूटिंग के अनुभव

कार्यक्रम में फिल्म से जुड़े विशाल चतुर्वेदी, शोभिनव सत्या, पूर्णिमा तिवारी, ऋषि पाठक तथा संगीतकार एवं गायक साधु तिवारी सहित टीम के अन्य सदस्य मौजूद रहे।

कलाकारों ने कैदियों के साथ फिल्म निर्माण, अपने किरदारों की तैयारी, शूटिंग के अनुभव और फिल्म के पीछे छिपे आध्यात्मिक संदेश को साझा किया। नीम करोली बाबा की भूमिका निभाने वाले शोभिनव सत्या और पूर्णिमा तिवारी, जो फिल्म में बाबा की पत्नी रामबेटी की भूमिका में हैं, इस फिल्म के प्रमुख चेहरों में हैं।

जिला जेल में हनुमान अंश फिल्म के कलाकार

‘पार्वती’ गीत से गूंज उठा जेल परिसर

कार्यक्रम में संगीत और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। संगीतकार एवं गायक साधु तिवारी ने फिल्म का चर्चित ‘पार्वती’ गीत प्रस्तुत किया। इसके बाद ऋषि पाठक ने राम नाम से जुड़ी संगीतमय प्रस्तुति दी।

फिल्म की टीम के साथ जेल में निरुद्ध कैदियों ने भी राम नाम के जाप और संकीर्तन में सहभागिता की। देखते ही देखते जेल परिसर में भक्ति के स्वर गूंजने लगे और वातावरण में एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति दिखाई देने लगी।

क्या है ‘हनुमान अंश’?

‘हनुमान अंश’ नीम करोली बाबा के जीवन, उनकी भक्ति और सेवा-दर्शन से प्रेरित हिंदी आध्यात्मिक फिल्म है। फिल्म का केंद्र भगवान राम और हनुमान के प्रति भक्ति, सेवा, प्रेम और समर्पण की भावना है। आधिकारिक फिल्म परिचय के अनुसार यह एक युवा साधक की आध्यात्मिक यात्रा को केंद्र में रखती है, जो आस्था और सेवा के मार्ग से आगे बढ़ते हुए नीम करोली बाबा के रूप में पहचाना जाता है।

फिल्म का लेखन और निर्देशन विशाल चतुर्वेदी ने किया है। फिल्म में शोभिनव सत्या नीम करोली बाबा की भूमिका में हैं। ‘हनुमान अंश’ 7 अगस्त 2026 को भारत में रिलीज हुई।

कौन थे नीम करोली बाबा?

नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्रेम से महाराज जी भी कहते हैं, 20वीं सदी के प्रसिद्ध भारतीय संतों में गिने जाते हैं। उनका जीवन भगवान हनुमान की भक्ति, सेवा, प्रेम और करुणा से जुड़ा रहा। उनका प्रमुख आश्रम कैंची धाम, उत्तराखंड में है, जो आज देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल है।

बाबा का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं रहा। उनकी शिक्षाओं से अनेक भारतीय और विदेशी साधक प्रभावित हुए। उनका मूल संदेश सरल था—प्रेम करो, सेवा करो और ईश्वर का स्मरण करो। 1973 में वृंदावन में उनका देहावसान हुआ, लेकिन उनके अनुयायियों के बीच उनकी आध्यात्मिक विरासत आज भी जीवित है।

विशेष पहल को मिला जेल प्रशासन और समाजसेवियों का सहयोग

इस विशेष आयोजन को सफल बनाने में प्रमुख उद्यमी पूरन डाबर तथा जिला जेल प्रशासन के हरिओम शर्मा का सहयोग रहा। फिल्म की टीम को जिला जेल तक लाने, जेल प्रशासन और कलाकारों के बीच समन्वय स्थापित करने तथा कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई।

स्वामी आनंद अग्रवाल और टीम ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

कार्यक्रम के आयोजन एवं संचालन को सफल बनाने में स्वामी आनंद अग्रवाल, राजदीप सिंह, आशीष शर्मा एवं सुबोध की सक्रिय भूमिका रही। उनके प्रयासों से फिल्म की टीम और जेल प्रशासन के बीच समन्वय बना तथा बंदियों के लिए यह अनूठा आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम संभव हो सका।

जेल में फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग का प्रस्ताव

फिल्म के सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश को देखते हुए ‘हनुमान अंश’ को उत्तर प्रदेश में टैक्स-फ्री किए जाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अनुरोध करने का प्रस्ताव भी रखा गया। इसके साथ ही आगरा जिला जेल में निरुद्ध कैदियों के लिए फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग कराने की अनुमति मांगी गई।

राम नाम के साथ सकारात्मक जीवन का संकल्प

कार्यक्रम का समापन राम नाम, भजन और सकारात्मक जीवन जीने के संकल्प के साथ हुआ। फिल्म की टीम ने बंदियों से कहा कि जीवन की परिस्थितियां चाहे जितनी कठिन क्यों न हों, मनुष्य के भीतर परिवर्तन की संभावना हमेशा बनी रहती है।

जेल की चारदीवारी के भीतर कुछ घंटों के लिए ही सही, जब राम नाम गूंजा तो यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि सुधार का रास्ता हर इंसान के लिए खुला है।

संपादकीय : जेल में राम नाम की गूंज केवल कार्यक्रम नहीं, परिवर्तन की दस्तक है

जेल को सामान्यतः हम अपराध, सजा और बंदिशों से जोड़कर देखते हैं। लेकिन जेल के भीतर रहने वाला व्यक्ति भी अंततः एक मनुष्य है—उसके भीतर भावनाएं हैं, पश्चाताप है, परिवार की यादें हैं और सबसे महत्वपूर्ण, बदलने की संभावना है। इसलिए सुधारात्मक गतिविधियों का महत्व किसी भी समाज में कम नहीं आंका जा सकता।

आगरा जिला जेल में ‘हनुमान अंश’ की स्टारकास्ट को बुलाकर कैदियों के साथ संवाद, भजन और राम नाम का संकीर्तन कराना इसी दृष्टि से एक सार्थक पहल है। यह आयोजन केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं था। इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि बंदियों को यह संदेश दिया गया कि गलत रास्ते पर चला जीवन भी सही दिशा में लौट सकता है।

नीम करोली बाबा के जीवन और शिक्षाओं का मूल भाव भी प्रेम, सेवा और मानवता से जुड़ा रहा है। ऐसे संदेश को जेल तक ले जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सकारात्मक विचारों की आवश्यकता शायद समाज के किसी भी दूसरे हिस्से से अधिक होती है।

इस पूरे आयोजन के लिए स्वामी आनंद अग्रवाल विशेष रूप से प्रशंसा के पात्र हैं। उन्होंने जिला जेल जैसे संवेदनशील स्थान पर एक ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने की पहल की, जिसमें अध्यात्म, कला, सिनेमा और सामाजिक सुधार—चारों का सुंदर समन्वय दिखाई दिया। यह आसान काम नहीं है। जेल प्रशासन, फिल्म कलाकारों और समाजसेवियों के बीच समन्वय स्थापित करना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है।

पूरन डाबर, हरिओम शर्मा, राजदीप सिंह, आशीष शर्मा, सुबोध और पूरी आयोजन टीम भी बधाई की पात्र है, जिन्होंने इस विचार को जमीन पर उतारने में सहयोग दिया।

आज समाज को केवल अपराध के बाद दंड देने की नहीं, बल्कि अपराध से पहले संस्कार और अपराध के बाद सुधार की भी आवश्यकता है। यदि एक बंदी भी इस कार्यक्रम के बाद अपने जीवन को बदलने का संकल्प लेता है, अपने परिवार के पास सम्मान के साथ लौटने की इच्छा पैदा करता है और समाज में दोबारा सकारात्मक भूमिका निभाने का निर्णय करता है, तो यह आयोजन सफल माना जाएगा।

जेल की दीवारें शरीर को रोक सकती हैं, विचारों और आत्मचेतना को नहीं। इसलिए वहां राम नाम की गूंज को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय परिवर्तन की संभावना के रूप में देखना चाहिए।

स्वामी आनंद अग्रवाल और उनके सहयोगियों का यह प्रयास इस मायने में उल्लेखनीय है कि उन्होंने जेल को कुछ समय के लिए ही सही, सजा की जगह आत्मचिंतन और निराशा की जगह आशा का केंद्र बना दिया।

— डॉ. भानु प्रताप सिंह, संपादक

Dr. Bhanu Pratap Singh