डॉ. भानु प्रताप सिंह
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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat. उत्तर प्रदेश के 7 जिलों में लागू पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली (Police Commissionerate) लागू है। क्या पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली से आम जनता को कोई लाभ हो रहा है, पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के बाद पुलिसिंग में सुधार हुआ है या नहीं? अन्य जिलों में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू करें या नहीं? इन सवालों पर आगरा के 27 प्रबुद्धजनों के साथ Additional Deputy Commissioner of Police (ADDL.DCP) आदित्य आईपीएस ने करीब पौने दो घंटा मंथन किया। कई चौंकाने वाले सुझाव दिए गए।
असल में, आईआईएम इंदौर के शोभित तिवारी यह सर्वे कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के सात जिलों में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद कोई लाभ हुआ है या नहीं। प्रशांत मेमोरियाल हॉल, पुलिस लाइंस, आगरा में उन्होंने पहले प्रश्नावली भरवाई। इसमें 20 प्रश्न हैं। मिल्टन पब्लिक स्कूल के राहुल राज पुलिस की व्यावसायिकता वाले सवाल पर अटक गए। उन्होंने पूछा इस सवाल का क्या मतलब है? इस पर शोभित ने कहा कि इसका मतलब प्रोफेशनलिज्म से है। प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. डीवी शर्मा ने कहा कि इसे व्यावसायिकता को पुलिस का व्यवसाय न समझा जाए। यह सुनकर सब मुस्करा उठे।
विश्वास और गोपनीयता का आश्वासन
पत्रकार डॉ. भानु प्रताप सिंह ने विनोदपूर्ण लहजे में कहा कि यह प्रश्नावली भरने के बाद पुलिस के पास तो नहीं जाएगी? शोभित ने कहा कि नहीं, मेरे पास ही रहेगी। यह सुनकर आईपीएस आदित्य मुस्करा उठे। उन्होंने कहा कि हम चाहते तो स्वयं भरकर दे सकते थे। आपसे फीडबैक इसलिए भरवा रहे हैं ताकि सही बात सामने आए।

सुधार की ओर पुलिस प्रशासनः आईपीएस आदित्य ने गिनाए 13 प्रमुख सुधार
आईपीएस आदित्य ने कहा, परसेप्शन और डाटा से सर्वे होता है। इसलिए यहां उपस्थित जनों का विचार महत्वपूर्ण है। हम तो आते-जाते रहेंगे और आपको यहीं पर रहना है। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली में किस तरह से सुधार हुआ है।
1.CCMS (कमिश्नर्स कोर्ट मॉनीटरिंग सिस्टम) लागू हुआ है, जिसमें वादी-प्रतिवादी अगली तारीख के बारे में ऑनलाइन जान सकते हैं। इसके लिए किसी को कोई फीस देने की जरूरत नहीं है।
2.पहले सामान्य झगड़ों में धारा 151 या 107/116 में चालान या पाबंद किया जाता था, कोर्ट से जमानत मिल जाती थी। फिर ये झड़े बार-बार होते रहते थे और बड़ा रूप ले लेते थे। इसे रोकने के लिए जेल भेजा जा रहा है ताकि झगड़ा आगे न हो।
3.पब्लिक न्यूसेंस जैसे अतिक्रमण, कूड़ा फेंकना, कूड़ा जलाना, तेज आवास में संगीत, खुले में मांस फेंकना, कारखानों का प्रदूषण, गिरासू भवन आदि के मामले में धारा 133 को प्रभावी किया गया है।
- कोर्ट केस के मामलों में अवकाश प्राप्त जिला जज से सलाह लेते हैं ताकि कानून का शत प्रतिशत पालन हो।
- महिला, दुष्कर्म, हत्या जैसे जघन्य अपराधों में सजा का प्रतिशत कई गुना बढ़ा है। एत्मादपुर में बच्ची से दुष्कर्म करने वाले को एक साल में ही सजा दिलाई गई।
- पिछले वर्ष जनसंवाद किया गया, जिसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
- पहले सिर्फ तीन आईपीएस अधिकारी थे, अब कई हैं। इससे अपराध नियंत्रण के साथ अन्य कार्य भी तेजी से निपटाए जा रहे हैं।
- फीड बैक सिस्टम बनाया गया है। पासपोर्ट की रिपोर्ट के संबंध में 60 हजार लोगों का फीड बैक है कि पुलिस को कोई पैसा नहीं दिया गया।
- स्कूलों के आसपास एंटी रोमियो टीम तैनात रहती है।
- थानी हरीपर्वत और कमलानगर सीसीटीवी से आच्छादित हो गए हैं। थाना सिकंदरा में काम चल रहा है। इससे अपराधियों को पकड़ने में सुविधा रहेगी।
- पुलिस के व्यवहार को लेकर चिंता जताई जाती है, हमने इसके लिए चुनिंदा पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिया है। इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
- परिवार परामर्श केंद्र में साउंडप्रूफ केबिन बनाए गए हैं ताकि दंपति की बातें गोपनीय रहें। इस दौरान उनके बच्चों के लिए अलग से व्यवस्था की गई है। पहले एक ही हॉल में बैठते थे, जिससे दंपति अपनी बात खुलकर नहीं बता पाते थे। इसका लाभ यह है कि अधिकांश दपति साथ जाने लगे हैं।
- पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद पुलिस की जवाबदेही बढ़ गई है।

प्रबुद्धजनों की प्रतिक्रियाः संवाद की गरिमा में विविध स्वर
डॉ. डीवी शर्माः एमजी रोड पर फुटपाथ को मेट्रो कार्य के साथ ही शीघ्र चौड़ा किया जाए, बाद में करेंगे तो फिर से समस्या होगी।
राजेंद्र सचदेवा, सचदेवा मिलेनियम स्कूलः हम पुलिस कमिश्नर से सीधी वार्ता कर पा रहे हैं, यह बड़ी बात है। पब्लिक मीटिंग होनी चाहिए ताकि एक साथ बहुत से लोगों को संदेश जाए।
डॉ. विजय श्रीवास्तव, प्राचार्य, आरबीएस कॉलेजः सिस्टम में सुधार है लेकिन कॉलेज के बाद अतिक्रमण नहीं हटाया जा रहा है। इसके बारे में दो साल से लिखकर दे रहे हैं।
राहुल कुलश्रेष्ठः स्कूलों की छुट्टी के समय कॉलेजों के बाहर पुलिस तैनात रहे ताकि कोई घटना न हो। गुजरात में चाकूबाजी के बाद संशय बना रहता है। चरित्र प्रमाणपत्र के लिए थाना में बुलाने का क्या औचित्य है।
गौरीशंकर उपाध्यायः मेरी भतीजी बीडी जैन कॉलेज में पढ़ती है। पहले मैं छोड़न और लेने जाता था। अब भतीजी अकेले आती-जाती है। पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद यह संभव हुआ है।
डॉ. भानु प्रताप सिंह पत्रकार एवं लेखकः पुलिस ही वादी है और पुलिस अधिकारी ही मजिस्ट्रे हैं, ऐसे में न्याय की उम्मीद कैसे करें? आईपीएस आदित्य ने कहा कि दूसरे सर्किल का अधिकारी मजिस्ट्रेट के रूप में होता है। वकीलों के तर्क सुनने और गुण-दोष के आधार पर फैसला होता है। यही कारण है कि कई मामलों में हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिलती है।

सांस्कृतिक सौगात एवं औपचारिक समापनः ‘जाणता राजा’ का चित्र भेंट
संचालन जिला शासकीय अधिवक्ता अशोक चौबे ने किया। उन्होंने बाद में आईपीएस आदित्य को छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र पर आधारित नाटक ‘जाणता राजा’ का चित्र भेंट किया।
कमिश्नरेट प्रणाली: एक दृष्टिकोणः क्या प्रणाली आमजन के लिए उपयोगी है?
बता दें कि पुलिस कमिश्नरेट में पुलिस अधिकारियों के पास अधिक शक्तियां होती हैं। ऐसे में उन्हें किसी अपराधी की गिरफ्तारी या कानून व्यवस्था को लागू करने के लिए किसी भी नागरिक अधिकारी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। पुलिस स्वयं से निर्णय लेकर जनपदों में कानून व्यवस्था को बेहतर रूप से बनाए रखने का प्रयास करती है। लखनऊ, नोएडा (गौतम बुद्ध नगर), वाराणसी, कानपुर, आगरा, प्रयागराज और गाजियाबाद में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू है।
उपस्थित महानुभाव
कार्यक्रम में डॉ. रवि पचौरी, डॉ. सीमा सिंह, डॉ. आनंद राय, डॉ. नरेंद्र शुक्ल, राकेश शर्मा, ओमवीर संभल, दीपक चतुर्वेदी, राजेश शर्मा, शैलेंद्र पाठक एडवोकेट, अजय शर्मा, हरजिंदर सिंह, डीएन दुबे, सर्वेश शर्मा, विकास कुमार आदि उपस्थित थे।

संपादकीयः “प्रणाली बदलने से व्यवस्था नहीं, दृष्टिकोण बदलने से सुधार आता है”
पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि एक परिवर्तन की संभावना है। उत्तर प्रदेश के सात प्रमुख जनपदों में इसका कार्यान्वयन न केवल कानून व्यवस्था को मजबूत कर रहा है, बल्कि नागरिकों के मन में सुरक्षा का भाव भी जागृत कर रहा है।
आईपीएस अधिकारी आदित्य के नेतृत्व में आगरा जैसे संवेदनशील और ऐतिहासिक शहर में जो प्रयास हो रहे हैं, वे यह संकेत देते हैं कि जब इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का समन्वय होता है, तब प्रणाली चाहे जो भी हो—परिणाम सकारात्मक आते हैं। सुधार केवल कार्यालयों की दीवारों में नहीं, बल्कि सड़कों पर, स्कूलों के बाहर, न्याय की प्रक्रिया में और सबसे अधिक आम नागरिकों के विश्वास में परिलक्षित होते हैं।
प्रबुद्धजनों द्वारा व्यक्त की गई शंकाएँ भी इस बात का संकेत हैं कि कोई भी प्रणाली पूर्ण नहीं होती। चरित्र प्रमाणपत्र की प्रक्रिया हो या पुलिस का व्यवहार, ऐसे अनेक बिंदु हैं जिन्हें और अधिक संवेदनशीलता एवं पारदर्शिता से देखने की आवश्यकता है।
डॉ. भानु प्रताप सिंह का यह प्रश्न—”जब पुलिस ही वादी हो और वही मजिस्ट्रेट भी, तो न्याय की निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित होगी?”—एक लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत मौलिक प्रश्न है। और यह भी संतोषजनक है कि पुलिस अधिकारी आदित्य ने इसका उत्तर खुले मन से दिया।
यह घटना न केवल पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम है, बल्कि शासन और जनता के बीच संवाद की एक सशक्त मिसाल भी है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रशासन जनता के प्रति कितना उत्तरदायी है और नागरिक कितने जागरूक।
इसलिए, अब समय है कि हम केवल प्रणालियों के नाम बदलने तक सीमित न रहें, बल्कि उस दृष्टिकोण को बदलें, जिससे हम शासन, न्याय और पुलिस व्यवस्था को देखते हैं। पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली तभी सार्थक होगी जब इसमें लोक सहभागिता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के तत्व जुड़े रहेंगे।
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