कोई पानी डाल दे तो मैं भी चौंच भर पीलूं: चुपचाप मरते परिंदों की पुकार

प्रियंका सौरभ तेज़ होती गर्मी, घटते जलस्रोत और बढ़ती कंक्रीट संरचनाओं के कारण पक्षियों के लिए पानी और छांव जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी दुर्लभ होती जा रही हैं। परिंदे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं, और अगर वे गायब हो गए तो यह धरती और भी सूनी हो जाएगी। आधुनिक समाज एसी चलाने में […]

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बाबा करें मोक्ष की बात, मगर मौत का डर: लेकिन खुद को चाहिए बॉडीगार्ड

जो संत मोक्ष, आत्मा की अमरता और मृत्यु से भयमुक्त रहने का उपदेश देते हैं, वे स्वयं भारी सुरक्षा घेरे में क्यों रहते हैं? डॉ सत्यवान सौरभ कैसे आज के आध्यात्मिक गुरु धर्म से अधिक इवेंट मैनेजमेंट में लगे हैं, और सरकारें उन्हें सुरक्षा देकर राजनीति और वोट बैंक साधती हैं। यदि बाबा वाकई मृत्यु […]

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विश्व विरासत दिवस: अपनी पहचान के लिए संघर्षरत आगरा को कब मिलेगा विरासत का ताज?

न शहर मॉडर्न हुआ न स्मार्ट, शहरवासी अपनी ऐतिहासिक विरासत पर फक्र भी नहीं करते, सदियों पुरानी इंडस्ट्रियल बेस को ध्वस्त करके क्या मिला, पूछता है आगरा आगरा, केवल एक शहर नहीं, बल्कि सदियों की मुहब्बत की जीती-जागती निशानी है। यह वह धरती है जिसने ताजमहल को अपनी गोद में पाला है, जो हिंदुस्तान की […]

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जातिगत विषमता को चुनौती देकर दलित–पीड़ित समुदायों को सशक्त करने के लिए फुले दंपत्ति की संघर्ष की गाथा पर चुनिंदा सेंसरशिप क्यों?

कल्पना पांडे ‘द स्टोरीटेलर’ जैसे गुणवत्तापूर्ण, संवेदनशील और अर्थपूर्ण फिल्म बनाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अनंत महादेवन निर्देशित ‘फुले’ फिल्म प्रदर्शन से पहले ही जबरदस्त विवादों में फँस गई है। ‘फुले’ मूलतः 11 अप्रैल 2025 को प्रदर्शित होने वाली थी, लेकिन महाराष्ट्र की कुछ ब्राह्मण संघटनों द्वारा जातीय भेदभाव को बढ़ावा देने के आरोपों के […]

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गोबर, गुस्सा और विश्वविद्यालय की गिरती गरिमा: जब शिक्षा की दीवारों पर गुस्सा पुता हो…

डॉo सत्यवान सौरभ,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा क्लासरूम और प्रिंसिपल के घर पर गोबर लिपने की घटना केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि एक गहरी असंतोष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी। इस विरोध ने सत्ता और शिक्षा व्यवस्था के पाखंड को उजागर किया — जहां एक ओर गोबर को सांस्कृतिक […]

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बीजिंग रिपोर्ट की चेतावनी: पानी, पेट और पहचान की लड़ाई… ग्रामीण महिलाओं पर जलवायु की चोट

प्रियंका सौरभ 2025 बीजिंग इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन भारत की ग्रामीण महिलाओं को असमान रूप से प्रभावित कर रहा है। सीमित संसाधनों, पारंपरिक सामाजिक भूमिकाओं और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के चलते वे जलवायु जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। गर्मी, सूखा, और चरम मौसम उनके प्रजनन स्वास्थ्य, कृषि आधारित आजीविका, और नौकरी के […]

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अब व्यापार के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: शर्बत भी बंटा हिन्दू और मुस्लिम में!

रामदेव के संघी झुकाव के बारे में सब जानते हैं। सब जानते है कि उसके भगवा चोले के अंदर एक कॉर्पोरेट बैठा हुआ है। रामदेव संघ-भाजपा की हिंदुत्व और कॉर्पोरेट गठजोड़ की राजनीति का नमूना भी है और उसका उत्पाद भी। इस रामदेव को लोगों ने सलवार-कुर्ता में डरकर भागते भी देखा है। इस पहनावे […]

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बाबा साहेब की विरासत पर सत्ता की सियासत, जयंती या सत्ता का स्वार्थी तमाशा?

“जयंती का शोर, विचारों से ग़ैरहाज़िरी”, “मूर्ति की पूजा, विचारों की हत्या”, “हाथ में माला, मन में पाखंड” प्रियंका सौरभ बाबा साहब के विचारों—जैसे सामाजिक न्याय, जातिवाद का उन्मूलन, दलित-पिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी, और संविधान की गरिमा की रक्षा—को आज के राजनेता पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं। राजनीतिक दल केवल वोट बैंक के […]

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सत्ता, शहादत और सवाल: जलियांवाला बाग की आज की प्रासंगिकता

डॉ सत्यवान सौरभ जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) केवल ब्रिटिश अत्याचार का प्रतीक नहीं, बल्कि आज के भारत में सत्ता और लोकतंत्र के बीच जटिल रिश्ते का प्रतिबिंब भी है। जनरल डायर द्वारा किए गए नरसंहार ने स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी, लेकिन यह भी सिखाया कि जब सत्ता निरंकुश हो जाए और जनता मौन, तो […]

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शिक्षा या कमीशन? निजी स्कूलों की किताबों के पीछे छुपा मुनाफाखोरी का खेल

प्रियंका सौरभ निजी स्कूल एनसीईआरटी की सस्ती और गुणवत्तापूर्ण किताबों की बजाय, कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें बच्चों पर थोपते हैं। हर साल जानबूझकर पाठ्यक्रम में मामूली बदलाव कर किताबें बदल दी जाती हैं ताकि पुराने संस्करण बेकार हो जाएं। स्कूलों और प्रकाशकों के गठजोड़ से चुनिंदा दुकानों पर ही ये […]

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