अध्यापकों की अनुपस्थिति में परीक्षा कराना अव्यवहारिक: स्टाफ क्लब
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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat. आगरा कॉलेज, आगरा के स्टाफ क्लब ने जून माह में बी.एससी. (कृषि) परीक्षा के प्रस्तावित आयोजन का कड़ा विरोध करते हुए प्राचार्य को एक आधिकारिक ज्ञापन सौंपा है। स्टाफ क्लब के सचिव प्रो. (डॉ.) विजय कुमार सिंह द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि यह समय विश्वविद्यालय के ग्रीष्मावकाश का है, जिसमें अधिकांश शिक्षक शहर से बाहर हैं। ऐसे में परीक्षा संचालन के लिए आवश्यक शैक्षणिक सहयोग उपलब्ध कराना संभव नहीं होगा।
अगस्त में परीक्षा कराने का सुझाव
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि परीक्षा का आयोजन अनिवार्य हो, तो उसे अगस्त माह में कराया जाए, जब सभी शिक्षकगण कॉलेज में उपस्थित रहेंगे। ऐसा करने से परीक्षा का संचालन सुव्यवस्थित और सफलतापूर्वक किया जा सकेगा। अन्यथा, जून में परीक्षा कराने की स्थिति में शिक्षकगण पूर्ण असहयोग करेंगे।
प्राचार्य को सौंपा गया ज्ञापन, प्रतिनिधिमंडल रहा उपस्थित
इस मुद्दे को लेकर स्टाफ क्लब के प्रतिनिधिमंडल ने आज कॉलेज प्राचार्य प्रो. सी. के. गौतम को आधिकारिक ज्ञापन सौंपा। इस प्रतिनिधिमंडल में प्रमुख रूप से प्रो. (डॉ.) विजय कुमार सिंह, डॉ. आनंद प्रताप सिंह, डॉ. दिग्विजय पाल सिंह, डॉ. विक्रम सिंह, डॉ. गौरव कौशिक, डॉ. रणजीत सिंह, डॉ. धर्मवीर सिंह यादव, डॉ. दिनेश कुमार मौर्य, प्रो. उमाकांत चौबे, डॉ. सुरेंद्र पाल सिंह और डॉ. सोवीर सिंह खिरवार शामिल रहे।
✍️ संपादकीय: शिक्षकों की उपेक्षा से नहीं चल सकता शिक्षा तंत्र
शिक्षा व्यवस्था किसी भी समाज की रीढ़ होती है, और शिक्षक उस व्यवस्था के स्तंभ। यदि किसी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में शैक्षणिक एवं प्रशासनिक निर्णय लेते समय शिक्षकों की व्यावहारिक स्थितियों की अनदेखी की जाती है, तो यह केवल शिक्षकों का ही नहीं, पूरी शिक्षा प्रणाली का अपमान है।
आगरा कॉलेज के मामले में ग्रीष्मावकाश के दौरान परीक्षा कराने का प्रस्ताव न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह शिक्षकों की भूमिका को सीमित करने वाला भी प्रतीत होता है। ग्रीष्मावकाश न केवल छात्रों के लिए, बल्कि शिक्षकों के लिए भी अनुसंधान, पुनर्नवाचार और मानसिक विश्राम का समय होता है। ऐसे में जब शिक्षक शहर से बाहर हों, तब परीक्षा संचालन की अपेक्षा करना केवल व्यवस्था थोपने जैसा है।
स्टाफ क्लब का ज्ञापन केवल विरोध नहीं है, बल्कि यह एक सकारात्मक सुझाव भी है—अगस्त में परीक्षा आयोजित करने का। यदि शिक्षा विभाग शिक्षकों के इस तर्कपूर्ण आग्रह की उपेक्षा करता है, तो यह एकतरफा प्रशासनिक दुराग्रह का उदाहरण होगा, जो न केवल परीक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा, बल्कि शिक्षकों और प्रबंधन के बीच विश्वास की खाई भी बढ़ाएगा।
समय आ गया है कि हम शिक्षकों को केवल ‘कार्यशील संसाधन’ मानने की बजाय उन्हें शिक्षा नीति निर्माण का सहभागी बनाएं। तभी हम एक सशक्त, समावेशी और टिकाऊ शिक्षा व्यवस्था की कल्पना कर सकते हैं।
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