लॉकडाउन में लक्ष्मी दाने-दाने को मोहताज, साहब को नहीं सुनाई देती मजलूमों की आवाज

लॉकडाउन में लक्ष्मी दाने-दाने को मोहताज, साहब को नहीं सुनाई देती मजलूमों की आवाज

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Pilibhit (Uttar Pradesh, India)। लॉकडाउन,  लॉकडाउन, लॉकडाउन। सभी अपने-अपने घरों में कैद रहें…इसी में सभी की भलाई है…फिक्र न करें… प्रशासन आपके साथ है…जरूरत मंदों की तुरंत मदद की जाएगी…! जिले के मुखिया की ये आवाज रोजाना लाउडस्पीकर के माध्यम से सुनाई देती है। लेकिन क्या उन्हें गरीबों-मजलूमों का दर्द दिखाई देता है…! क्या साहब को भूखे बच्चों की चीखें सुनाई देती हैं…! शायद नहीं। ये आवाजें सुनाईं देती तो जिले में शायद कोई घर ऐसा न होता जहां लोग भूखे सोते।
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कांसीराम कॉलोनी की कहानी

मामला जनपद के कोतवाली थाना क्षेत्र के अंतर्गत कांसीराम कालोनी का है। लॉकडाउन के चलते अब स्थिति ये है कि लोग पुलिस के डंडे के डर से अपने घरों में छुपे बैठे हैं, खाने को घर में एक दाना तक नहीं है। कभी कहीं से निवाला मिल गया तो मुंह में चल गया, अन्यथा पानी पीकर पेट को दबाकर अपने बच्चों के साथ सो जाना ही इनकी नियति बन गया है। इन दरिद्र नारायणों की पहुंच न तो नेताजी तक है,  और न ही सांसद व विधायक तक। और रही बात प्रशासन व पुलिस की तो इनको भी इन मजलूमों के दर्द से कोई सरोकार नहीं है। लिहाज़ा ये हकीकत केंद्र व प्रदेश सरकार की मंशा को पलीता लगाते प्रशासन के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।
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लक्ष्मी का दर्द

कांसीराम कालोनी में रह रही लक्ष्मी कब से चिल्ला रही है उसका घर बीमारी की चपेट में है। बेटा लम्बे वक़्त से बिस्तर पर है, उसके शरीर में खून नहीं रह गया है, वह पीला पड़ गया है। घर में खाने को रोटी नहीं है और पैसा भी पल्ले नहीं है। सरकारी अस्पताल जा नहीं सकते, बड़े अस्पताल की हैसियत नहीं है। 500 रुपये खाते में आये हैं, लेकिन इनसे होगा क्या ? साहब जरूरतें बहुत हैं हम कई दिनों से भूखे हैं। प्रशासन की तरफ से हमे अभी तक किसी प्रकार का कोई निःशुल्क राशन अभी तक नहीं मिला है। पीड़िता के पति लल्लू का कहना है कि वो पेशे से कारीगर है। शादी पार्टियों में लजीज खाना बनाने वाले आज खुद दो निवाले को तरस रहा है।
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कांसीराम कॉलोनी में रहन वालों का दर्द प्रशासन नहीं सुन रहा है।

बूढ़ी अम्मा किरण का दर्द

एक और दूसरा गरीब परिवार है जो भूख का दंश झेल रहा है। इस परिवार की मुखिया बूढ़ी अम्मा किरण है, उसकी स्थिति भी बदतर है। एक बेटा है जो कानों से सुन नहीं सकता है और उसकी छाती में भयंकर चर्मरोग है। गरीबी की मार झेल रही 80 साल की बुजुर्ग किरण स्वयं कूड़ा बीनकर परिवार का पेट जैसे तैसे पालती है। लेकिन लॉकडाउन के चलते अब ये भी सम्भव नहीं रहा। घर में न राशन है और न ही रसोई,  जैसे- तैसे  लकड़ियां बीनकर चूल्हा जलाया जाता है। अब राशन समाप्त हो गया है तो चूल्हा भी शांत है। आश्चर्य तो ये है कि पिछले दो वर्षों से इस परिवार के पास राशन कार्ड तक नहीं है।
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कहां हैं समाजसेवी

क्या यही है प्रशासन की चाक चौबंद व्यवस्था ?  कहां है सांसद की रसोई और कहां है प्रशासन की मदद। शासन के किस दावे की बात करता घूम रहा है प्रशासन। आलाकमान कौन सी मदद की बात कर रहा है, क्या कर रही है कर्तव्य परायण पुलिस ?  कहां है फोटो खिंचवाकर मदद करने वाले समाजसेवी ? ये किसी एक परिवार की कहानी नहीं है न जाने कितने ही ऐसे घर हैं जहां लॉकडाउन के चलते न खाने को रोटी है और न मदद की कोई उम्मीद !

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